भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 523

कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता-
च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत ।
वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः
पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥४९

प्रादुश्चकर्थ यदिदं पुरुहूत रूपं
तेनेश निर्वृतिमवापुरलं दृशो नः ।
तस्मा इदं भगवते नम इद्विधेम
योऽनात्मनां दुरदयो भगवान् प्रतीतः ॥५०

भगवन्! यदि हमारा चित्त भौंरेकी तरह आपके चरणकमलोंमें ही रमण करता रहे, हमारी वाणी तुलसीके समान आपके चरणसम्बन्धसे ही सुशोभित हो और हमारे कान आपकी सुयश-सुधासे परिपूर्ण रहें तो अपने पापोंके कारण भले ही हमारा जन्म नरकादि योनियोंमें हो जाय—इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है ॥४९॥ विपुलकीर्ति प्रभो! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नेत्रोंको बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त कठिन है। आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रोंके सामने प्रकट हुए हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं ॥५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे जयविजययोः सनकादिशापो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥


१. प्रा० पा०—कृतालोके। २. प्रा० पा०—शिरोमणे। ३. प्रा० पा०—ये त्वामनन्यभावेन। ४. प्रा० पा०—मुख्यात्मने नमः।
१. प्रा० पा०—गन्धेऽन्विते।
१. प्रा० पा०—त्तवीर्यां। २. प्रा० पा०—ऽभ्यर्चिता०। ३. प्रा० पा०—ननु।
१. प्रा० पा०—सर्वेऽपि ते। २. प्रा० पा०—स्ववृत्त्या। ३. प्रा० पा०—सम्यग्विहस्य। ४. प्रा० पा०—तद्धर्मणां।