श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचुक्रोश विमना वार्धिरूर्मिः क्षुभितोदरः । सोदपानाश्च सरितश्चुक्षुभुः शुष्कपङ्कजाः ॥७
मुहुः परिवयोऽभूवन् सराह्वोः शशिसूर्ययोः । निर्घाता रथनिर्ह्रादा विवरेभ्यः प्रजज्ञिरे ॥८
अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् । सृगालोलूकटङ्कारैः प्रणेदुरशिवं शिवाः ॥९
संगीतवद्रोदनवदुन्नमय्य शिरोधराम् । व्यमुञ्चन् विविधा वाचो ग्रामसिंहास्ततस्ततः ॥१०
खराश्च कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् । खत्कारैरभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥११
रुदन्तो रासभत्रस्ता नीडादुदपतन् खगाः । घोषेऽरण्ये च पशवः शकृन्मूत्रमकुर्वत ॥१२
गावोऽत्रसन्नसृग्दोहास्तोयदाः पूयवर्षिणः । व्यरुदन्देवलिङ्गानि द्रुमाः पेतुर्विनानिलम् ॥१३
ग्रहान् पुण्यतमानन्ये भगणांश्चापि दीपिताः । अतिचेरूर्वक्रगत्या युयुधुश्च परस्परम् ॥१४
दृष्ट्वांन्यांश्च महोत्पातानतत्तत्त्वविदः प्रजाः । ब्रह्मपुत्रानृते भीता मेनिरे विश्वसम्प्लवम् ॥१५
बिजली जोर-जोरसे चमककर मानो खिलखिला रही थी। घटाओंने ऐसा सघन रूप धारण किया कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहोंके लुप्त हो जानेसे आकाशमें गहरा अँधेरा छा गया। उस समय कहीं कुछ भी दिखायी न देता था ॥६॥
समुद्र दुःखी मनुष्यकी भाँति कोलाहल करने लगा, उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उठने लगीं और उसके भीतर रहनेवाले जीवोंमें बड़ी हलचल मच गयी। नदियों तथा अन्य जलाशयोंमें भी बड़ी खलबली मच गयी और उनके कमल सूख गये ॥७॥ सूर्य और चन्द्रमा बार-बार ग्रसे जाने लगे तथा उनके चारों ओर अमंगलसूचक मण्डल बैठने लगे। बिना बादलोंके ही गरजनेका शब्द होने लगा तथा गुफाओंमेंसे रथकी घरघराहटका-सा शब्द निकलने