भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 536

स वर्षपूगानुदधौ महाबल- ञ्श्चरन्महोर्मीञ्छ्वसनेरितान्मुहुः । मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी- मासेदिवांस्तात पुरीं प्रचेतसः ॥२६

तत्रोपलभ्यासुरलोकपालकं यादोगणानामृषभं प्रचेतसम् । स्मयन् प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव- ज्जगाद मे देह्यधिराज संयुगम् ॥२७

त्वं लोकपालोऽधिपतिर्बृहच्छ्रवा वीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम् । विजित्य लोकेऽखिलदैत्यदानवान् यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो ॥२८

स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषा दृढं प्रलब्धो भगवानपां पतिः । रोषं समुत्थं शमयन् स्वया धिया व्यवोचदङ्गोपशमं गता वयम् ॥२९

पश्यामि नान्यं पुरुषात्पुरातनाद् यः संयुगे त्वां रणमार्गकोविदम् । आराधयिष्यत्यसुरर्षभेहि तं मनस्विनो यं गृणते भवादृशाः ॥३०

तं वीरमारादभिपद्य विस्मयः शयिष्यसे वीरशये श्वभिर्वृतः । यस्त्वद्विधानामसतां प्रशान्तये रूपाणि धत्ते सदनुग्रहेच्छया ॥३१

फिर वह महाबली दैत्य वहाँसे लौटकर जलक्रीडा करनेके लिये मतवाले हाथीके समान गहरे समुद्रमें घुस गया, जिसमें लहरोंकी बड़ी भयंकर गर्जना हो रही थी ।।२४।। ज्यों ही उसने समुद्रमें पैर रखा कि डरके मारे वरुणके सैनिक जलचर जीव हकबका गये और किसी प्रकारकी छेड़छाड़ न करनेपर भी वे उसकी धाकसे ही घबराकर बहुत दूर भाग गये ।।२५।। महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षोंतक समुद्रमें ही घूमता और सामने किसी प्रतिपक्षीको न पाकर बार-बार वायुवेगसे उठी हुई उसकी प्रचण्ड तरंगोंपर ही अपनी लोहमयी गदाको आजमाता रहा। इस प्रकार घूमते-घूमते वह वरुणकी राजधानी विभावरीपुरीमें जा पहुँचा ।।२६।। वहाँ पाताललोकके स्वामी, जलचरोंके अधिपति वरुणजीको देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्यकी भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंगसे कहा—'महाराज! मुझे

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