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श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 540

युष्मद्विधान्मृगये ग्रामसिंहान् ।

न मृत्युपाशैः प्रतिमुक्तस्य वीरा

विकत्थनं तव गृह्णन्त्यभद्र ॥१०

एते वयं न्यासहरा रसौकसां

गतह्रियो गदया द्रावितास्ते ।

तिष्ठामहेऽथापि कथञ्चिदाजौ

स्थेयं क्व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम् ॥११

त्वं पद्रथानां किल यूथपाधिपो

घटस्व नोऽस्वस्तय आश्वनूहः ।

संस्थाप्य चास्मान् प्रमृजाश्रु स्वकानां

यः स्वां प्रतिज्ञां नातिपिपर्त्यसभ्यः ॥१२

मैत्रेय उवाच

सोऽधिक्षिप्तो भगवता प्रलब्धश्च रुषा भृशम् ।

आजहारोल्बणं क्रोधं क्रीड्यमानोऽहिराडिव ॥१३

सृजन्नमर्षितः श्वासानन्मन्युप्रचलितेन्द्रियः ।

आसाद्य तरसा दैत्यो गदयाभ्यहनद्धरिम् ॥१४

भगवान्ने पृथ्वीको ले जाकर जलके ऊपर व्यवहारयोग्य स्थानमें स्थित कर दिया और

उसमें अपनी आधारशक्तिका संचार किया। उस समय हिरण्याक्षके सामने ही ब्रह्माजीने

उनकी स्तुति की और देवताओंने फूल बरसाये ॥८॥ तब श्रीहरिने बड़ी भारी गदा लिये अपने

पीछे आ रहे हिरण्याक्षसे, जो सोनेके आभूषण और अद्भुत कवच धारण किये था तथा

अपने कटुवाक्योंसे उन्हें निरन्तर मर्माहत कर रहा था, अत्यन्त क्रोधपूर्वक हँसते हुए

कहा ॥९॥

श्रीभगवान्ने कहा—अरे! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुझ-जैसे ग्रामसिंहों

(कुत्तों)-को ढूँढ़ते फिरते हैं। दुष्ट! वीर पुरुष तुझ-जैसे मृत्युपाशमें बँधे हुए अभागे जीवोंकी

आत्मश्लाघापर ध्यान नहीं देते ॥१०॥ हाँ, हम रसातलवासियोंकी धरोहर चुराकर और

लज्जा छोड़कर तेरी गदाके भयसे यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-

जैसे अद्वितीय वीरके सामने युद्धमें ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं;

तुझ-जैसे बलवानोंसे वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं? ॥११॥ तू पैदल वीरोंका

सरदार है, इसलिये अब निःशंक होकर—उधेड़-बुन छोड़कर हमारा अनिष्ट करनेका प्रयत्न

कर और हमें मारकर अपने भाई-बन्धुओंके आँसू पोंछ। अब इसमें देर न कर। जो अपनी

प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह असभ्य है—भले आदमियोंमें बैठने लायक नहीं है ॥१२॥

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