श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर ब्रह्माजीने सात्त्विकी प्रभासे देदीप्यमान होकर मुख्य-मुख्य देवताओंकी रचना की। उन्होंने क्रीडा करते हुए, ब्रह्माजीके त्यागनेपर, उनका वह दिनरूप प्रकाशमय शरीर ग्रहण कर लिया ।।२२।। इसके पश्चात् ब्रह्माजीने अपने जघनदेशसे कामासक्त असुरोंको उत्पन्न किया। वे अत्यन्त कामलोलुप होनेके कारण उत्पन्न होते ही मैथुनके लिये ब्रह्माजीकी ओर चले ।।२३।। यह देखकर पहले तो वे हँसे; किन्तु फिर उन निर्लज्ज असुरोंको अपने पीछे लगा देख भयभीत और क्रोधित होकर बड़े जोरसे भागे ।।२४।। तब उन्होंने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उनकी भावनाके अनुसार दर्शन देनेवाले, शरणागतवत्सल वरदायक श्रीहरिके पास जाकर कहा— ।।२५।। 'परमात्मन्! मेरी रक्षा कीजिये; मैंने तो आपकी ही आज्ञासे प्रजा उत्पन्न की थी, किन्तु यह तो पापमें प्रवृत्त होकर मुझको ही तंग करने चली है ।।२६।। नाथ! एकमात्र आप ही दुःखी जीवोंका दुःख दूर करनेवाले हैं और जो आपकी चरणशरणमें नहीं आते, उन्हें दुःख देनेवाले भी एकमात्र आप ही हैं' ।।२७।।
सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः । विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ।।२८
तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् । कांचीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ।।२९
अन्योन्यश्लेषयोत्तुंगनिरन्तरपयोधराम् । सुनासां सुद्विजां स्निग्धहासलीलावलोकनाम् ।।३०
गूहन्तीं व्रीडयाऽऽत्मानं नीलालकवरूथिनीम् । उपलभ्यासुर्रा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम् ।।३१
अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः । मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति ।।३२
वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम् । अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः ।।३३
कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि । रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे ।।३४
या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव । उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः ।।३५