श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये मे स्वधर्मनिरतस्य तपःसमाधि- विद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादाः । तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान् दृष्टिं प्रपश्य वितराम्यभयानशोकान् ॥७
अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्दिजृम्भ- विभ्रंशितार्थरचनाः किमुरुक्रमस्य । सिद्धासि भुङ्क्ष्व विभवान्निजधर्मदोहान्१ दिव्यान्नरैर्दुरधिगान्नृपविक्रियाभिः ॥८
एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया- विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीत् । सम्पश्रयप्रणयविह्वलया गिरैषद्व्री- डावलोकविलसद्धसिताननाऽऽह ॥९
देवहूतिरुवाच
राद्धं बत२ द्विजवृषैतदमोघयोग- मायाधिपे त्वयि विभो तदवैमि भर्तः । यस्तेऽभ्यधायि समयः सकृदंगसंगो भूयाद्गरीयसि गुणः प्रसवः३ सतीनाम् ॥१०
कर्दमजी बोले—मनुनन्दिनि! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है। मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। सभी देहधारियोंको अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदरकी वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवाके आगे उसके क्षीण होनेकी भी कोई परवा नहीं की ॥६॥ अतः अपने धर्मका पालन करते रहनेसे मुझे तप, समाधि, उपासना और योगके द्वारा जो भय और शोकसे रहित भगवत्प्रसाद-स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं, उनपर मेरी सेवाके प्रभावसे अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है। मैं तुम्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो ॥७॥ अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरिके भ्रुकुटि-विलासमात्रसे नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं हैं। तुम मेरी सेवासे भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत-धर्मका पालन करनेसे तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो। हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्योंको इन दिव्य भोगोंकी प्राप्ति होनी कठिन है ॥८॥
कर्दमजीके इस प्रकार कहनेसे अपने पतिदेवको सम्पूर्ण योगमाया और विद्याओंमें कुशल जानकर उस अबलाकी सारी चिन्ता जाती रही। उसका मुख किंचित् संकोचभरी चितवन और मधुर मुसकानसे खिल उठा और वह विनय एवं प्रेमसे गद्गद वाणीमें इस प्रकार