श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है ।।५५।।
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते ।
न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ।।५६
साहं भगवतो नूनं वंचिता मायया दृढम् ।
यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात् ।।५७
संसारमें जिस पुरुषके कर्मोंसे न तो धर्मका सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान्की सेवा ही सम्पन्न होती है वह पुरुष जीते ही मुर्देके समान है ।।५६।। अवश्य ही मैं भगवान्की मायासे बहुत ठगी गयी, जो आप-जैसे मुक्तिदाता पतिदेवको पाकर भी मैंने संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छा नहीं की ।।५७।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने
त्रयोविंशोऽध्यायः ।।२३।।
१. प्रा० पा०—निजवर्त्मदो। २. प्रा० पा०—तव। ३. प्रा० पा०—प्रभवः।
१. प्रा० पा०—मालाभि०। २. प्रा० पा०—द्वाःस्थविद्रु०।
१. प्रा० पा०—विक्कू। २. प्रा० पा०—सविमानांश्च समन्तादधिरुह्य। ३. प्रा० पा०—इत्थं गृहं तस्य पश्यन्नतिप्रीतेन। ४. प्रा० पा०—प्रोवाच कर्दमः। ५. प्रा० पा०—यद्द्रवेन्नृ०। ६. प्रा० पा०—भूते। ७. प्रा० पा०—मानिताः।
१. प्रा० पा०—रेतः स्वं। २. प्रा० पा०—नवधा।