श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 591, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंबहुत काल बीतनेपर प्रसन्न होते हैं ॥२७॥ किन्तु जिनके स्वरूपको योगिजन अनेकों जन्मोंके साधनसे सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधिके द्वारा एकान्तमें देखनेका प्रयत्न करते हैं, अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाले वे ही श्रीहरि हम विषयलोलुपोंके द्वारा होनेवाली अपनी अवज्ञाका कुछ भी विचार न कर आज हमारे घर अवतीर्ण हुए हैं ॥२८-२९॥ स्वीयं वाक्यमृतं कर्तुमवतीर्णोऽसि मे गृहे । चिकीर्षुर्भगवान् ज्ञानं भक्तानां मानवर्धनः ॥३० तान्येव तेऽभीरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव । यानि यानि च रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥३१ त्वां सूरिभिस्तत्त्वबुभुत्सयाद्धा सदाभिवादार्हणपादपीठम् । ऐश्वर्यवैराग्ययशोऽवबोध- वीर्यश्रिया पूर्तमहं प्रपद्ये ॥३२ परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् । आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥३३ आ स्माभिप्रृच्छेऽद्य पतिं प्रजानां त्वयावतीर्णार्ण उताप्तकामः । परिव्रजत्पदवीमास्थितोऽहं चरिष्ये त्वां हृदि युञ्जन्१ विशोकः ॥३४
श्रीभगवानुवाच
मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके२ । अथाजनि मया तुभ्यं यदवोचमृतं मुने ॥३५ एतन्मे जन्म लोकेऽस्मिन्मुमुक्षूणां दुराशयात् । प्रसंख्यानाय तत्त्वानां सम्मतायात्मदर्शने ॥३६ एष आत्मपथोऽव्यक्तो नष्टः कालेन भूयसा । तं प्रवर्तयितुं देहमिमं विद्धि मया भृतम् ॥३७
आप वास्तवमें अपने भक्तोंका मान बढ़ानेवाले हैं। आपने अपने वचनोंको सत्य करने और सांख्ययोगका उपदेश करनेके लिये ही मेरे यहाँ अवतार लिया है ॥३०॥ भगवन्! आप प्राकृतरूपसे रहित हैं, आपके जो चतुर्भुज आदि अलौकिक रूप हैं वे ही आपके योग्य हैं तथा
******ebook converter DEMO Watermarks*******