श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरुण नयन एवं मनोहर मुखारविन्दसे युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपोंकी झाँकी करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं, जिसके लिये बड़े-बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं ।।३५।। दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणीसे युक्त मेरे उन रूपोंकी माधुरीमें उनका मन और इन्द्रियाँ फँस जाती हैं। ऐसी मेरी भक्ति न चाहनेपर भी उन्हें परमपदकी प्राप्ति करा देती है ।।३६।।
अथो विभूतिं मम मायाविनस्ता- मैश्वर्यमष्टांगमनुप्रवृत्तम् । श्रियं भागवतीं वास्पृहयन्ति भद्रां परस्य मे तेऽश्नुवते तु लोके ।।३७
न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः । येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् ।।३८
इमं लोकं तथैवामुमात्मानमुभयायिनम् । आत्मानमनु ये चेह ये रायः पशवो गृहाः ।।३९
विसृज्य सर्वानन्यांश्च मामेवं विश्वतोमुखम् । भजन्त्यनन्यया भक्त्या तान्मृत्योरतिपारये¹ ।।४०
नान्यत्र मद्भगवतः प्रधानपुरुषेश्वरात् । आत्मनः सर्वभूतानां भयं तीव्रं² निवर्तते ।।४१
मद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति मद्भयात् । वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरति मद्भयात् ।।४२
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिनः । क्षेमाय पादमूलं मे विशन्त्यकुतोभयम्³ ।।४३
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां निःश्रेयसोदयः । तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम् ।।४४
अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर यद्यपि वे मुझ मायापतिके सत्यादि लोकोंकी
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