श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वचं रोमभिरोषध्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रेतसा शिश्नमापस्तु नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।।६५
गुदं मृत्युरपानेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हस्ताविन्द्रो बलेनैव नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।।६६
विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत्तदा विराट् । नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।।६७
क्षुत्तृड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।।६८
बुद्ध्या ब्रह्मापि हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रुद्रोऽभिमत्य हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् ।।६९
चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा । विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ।।७०
यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः । प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा ।।७१
तमस्मिन् प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया । भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ।।७२
सूर्यने चक्षुके सहित नेत्रोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा। दिशाओंने श्रवणेन्द्रियके सहित कानोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ।।६४।।
ओषधियोंने रोमोंके सहित त्वचामें प्रवेश किया फिर भी विराट् पुरुष न उठा। जलने वीर्यके साथ लिंगमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा ।।६५।। मृत्युने अपानके साथ गुदामें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा। इन्द्रने बलके साथ हाथोंमें प्रवेश किया, परन्तु इससे भी विराट् पुरुष न उठा ।।६६।। विष्णुने गतिके सहित चरणोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा। नदियोंने रुधिरके सहित नाडियोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा ।।६७।। समुद्रने क्षुधा-पिपासाके सहित उदरमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा। चन्द्रमाने मनके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ।।६८।। ब्रह्माने बुद्धिके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा। रुद्रने अहंकारके सहित उसी हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ।।६९।।