श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नामाष्टाविंशोऽध्यायः ।।२८।।
* ‘आत्मानमस्य जगतो निर्लेपमगुणामलम् । विभर्ति कौस्तुभमणिं स्वरूपं भगवान् हरिः ।।’
अर्थात् इस जगत्की निर्लेप, निर्गुण, निर्मल तथा स्वरूपभूत आत्माको कौस्तुभमणिके रूपमें भगवान् धारण करते हैं।