भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वह जहाँ-तहाँ थककर गिर जाता है, मूर्च्छा आ जाती है, चेतना आनेपर फिर उठता है। इस प्रकार अति दुःखमय अँधेरे मार्गसे अत्यन्त क्रूर यमदूत उसे शीघ्रतासे यमपुरीको ले जाते हैं।।२३।। यमलोकका मार्ग निन्यानबे हजार योजन है। इतने लम्बे मार्गको दो-ही-तीन मुहूर्तमें तय करके वह नरकमें तरह-तरहकी यातनाएँ भोगता है ।।२४।।

वहाँ उसके शरीरको धधकती लकड़ियों आदिके बीचमें डालकर जलाया जाता है, कहीं स्वयं और दूसरोंके द्वारा काट-काटकर उसे अपना ही मांस खिलाया जाता है ।।२५।। यमपुरीके कुत्तों अथवा गिद्धोंद्वारा जीते-जी उसकी आँतें खींची जाती हैं। साँप, बिच्छू और डाँस आदि डसनेवाले तथा डंक मारनेवाले जीवोंसे शरीरको पीड़ा पहुँचायी जाती है ।।२६।।

शरीरको काटकर टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं। उसे हाथियोंसे चिरवाया जाता है, पर्वतशिखरोंसे गिराया जाता है अथवा जल या गढ़ेमें डालकर बन्द कर दिया जाता है।।२७।।

यास्तामिस्रान्धतामिस्रा रौरवाद्याश्च यातनाः । भुङ्क्ते नरो वा नारी वा मिथः सङ्गेन निर्मताः ।।२८

अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते । या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिताः ।।२९

एवं कुटुम्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा । विसृज्येहोभयं प्रेत्य भुङ्क्ते तत्फलमीदृशम् ।।३०

एकः प्रपद्यते ध्वान्तं हित्वेदं स्वकलेवरम् । कुशलेतरपाथेयो भूतद्रोहेण यद्-भृतम ।।३१

दैवेनासादितं तस्य शमलं निरये पुमान् । भुङ्क्ते कुटुम्बपोषस्य हृतवित्त इवातुरः ।।३२

केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः । याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम् ।।३३

अधस्तान्नरलोकस्य यावतीर्यातनादयः । क्रमशः समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचिः ।।३४

ये सब यातनाएँ तथा इसी प्रकार तामिस्रा, अन्धतामिस्र एवं रौरव आदि नरकोंकी और भी अनेकों यन्त्रणाएँ, स्त्री हो या पुरुष, उस जीवको पारस्परिक संसर्गसे होनेवाले पापके कारण भोगनी ही पड़ती हैं ।।२८।। माताजी! कुछ लोगोंका कहना है कि स्वर्ग और नरक तो

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