भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 673

पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य-पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की। वे तीनों अपने-अपने वाहन—हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे ।।२३-२४।। उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं ।।२५।। वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे ।।२६।।

अत्रि मुनिने कहा—भगवन्! प्रत्येक कल्पके आरम्भमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये जो मायाके सत्त्वादि तीनों गुणोंका विभाग करके भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं—वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आप ही हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कहिये—मैंने जिनको बुलाया था, आपमेंसे वे कौन महानुभाव हैं? ।।२७।।

एको मयेह भगवान् विबुधप्रधान- श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम् । अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूरा ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ।।२८

मैत्रेय उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः । प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो ।।२९

देवा ऊचुः

यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम् ।।३० अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः । भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः ।।३१ एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्वराः । सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः ।।३२ सोमोऽभूद्ब्रह्मणोऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ।।३३ श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः । सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा ।।३४