श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्मा प्रभो! आप जगत्की उत्पत्तिके हेतु हैं। आपकी मायासे रचा हुआ यह परम आश्चर्यमय त्रिगुणात्मक जगत् आपहीमें भास रहा है। किंतु मैं तो स्त्रीस्वभाव होनेके कारण आपके तत्त्वसे अनभिज्ञ और बहुत दीन हूँ। इसलिये इस समय अपनी जन्मभूमि देखनेको बहुत उत्सुक हो रही हूँ ॥११॥ जन्मरहित नीलकण्ठ! देखिये—इनमें कितनी ही स्त्रियाँ तो ऐसी हैं, जिनका दक्षसे कोई सम्बन्ध भी नहीं है। फिर भी वे अपने-अपने पतियोंके सहित खूब सज-धजकर झुंड-की-झुंड वहाँ जा रही हैं। वहाँ जानेवाली इन देवांगनाओंके राजहंसके समान श्वेत विमानोंसे आकाशमण्डल कैसा सुशोभित हो रहा है ॥१२॥
कथं सुतायाः पितृगेहकौतुकं निशम्य देहः सुरवर्य नेङ्गते । अनाहुता अप्यभियन्ति सौहृदं भर्तुर्गुरोर्देहकृतश्च केतनम् ॥१३
तन्मे प्रसीदमर्त्य वाञ्छितं कर्तुं भवान्कारुणिको बतार्हति । त्वयाऽऽत्मनोऽर्धेऽह्मदभ्रचक्षुषा निरूपिता मानुगृहाण याचितः ॥१४
ऋषिरुवाच
एवं गिरित्रः प्रिययाभिभाषितः प्रत्यभ्यधत्त प्रहसन् सुहृत्प्रियः । संस्मारितो मर्मभिदः कुवागिषून् यानाह को विश्वसृजां समक्षतः ॥१५
श्रीभगवानुवाच
त्वयोदितं शोभनमेव शोभने अनाहुता अप्यभियन्ति बन्धुषु । ते यद्यनुत्पादितदोषदृष्टयो बलीयसानात्ममदेन मन्युना ॥१६
विद्यातपोवित्तवपुर्वयःकुलैः सतां गुणैः षड्भिरसत्तमेतरैः । स्मृतौ हतायां भृतमानदुर्दृशः स्तब्धा न पश्यन्ति हि धाम भूयसाम् ॥१७
नैतादृशानां स्वजनव्यपेक्षया
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