भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उनका हृदय भर आया और वे आँखोंमें आँसू भरकर अत्यन्त व्याकुल हो रोने लगीं। उनका शरीर थर-थर काँपने लगा और वे अप्रतिम पुरुष भगवान् शंकरकी ओर इस प्रकार रोषपूर्ण दृष्टिसे देखने लगीं मानो उन्हें भस्म कर देंगी ।।२।। शोक और क्रोधने उनके चित्तको बिलकुल बेचैन कर दिया तथा स्त्रीस्वभावके कारण उनकी बुद्धि मूढ़ हो गयी। जिन्होंने प्रीतिवश उन्हें अपना आधा अंगतक दे दिया था, उन सत्पुरुषोंके प्रिय भगवान् शंकरको भी छोड़कर वे लंबी-लंबी साँस लेती हुई अपने माता-पिताके घर चल दीं ।।३।। सतीको बड़ी फुर्तीसे अकेली जाते देख श्रीमहादेवजीके मणिमान् एवं मद आदि हजारों सेवक भगवान्‌के वाहन वृषभराजको आगे कर तथा और भी अनेकों पार्षद और यक्षोंको साथ ले बड़ी तेजीसे निर्भयतापूर्वक उनके पीछे हो लिये ।।४।। उन्होंने सतीको बैलपर सवार करा दिया तथा मैना पक्षी, गेंद, दर्पण और कमल आदि खेलकी सामग्री, श्वेत छत्र, चँवर और माला आदि राजचिह्न तथा दुन्दुभि, शंख और बाँसुरी आदि गाने-बजानेके सामानोंसे सुसज्जित हो वे उनके साथ चल दिये ।।५।।

आब्रह्मघोषोर्जितयज्ञवैशसं विप्रर्षिजुष्टं विबुधैश्च सर्वशः। मृद्दार्वयःकांचनदर्भचर्मभि- र्निसृष्टभाण्डं यजनं समाविशत् ।।६

तामागतां तत्र न कश्चनाद्रियद् विमानितां यज्ञकृतो भयाज्जनः। ऋते स्वसॄर्वै जननीं च सादराः प्रेमाश्रुकण्ठ्यः परिषस्वजुर्मुदा ।।७

सौदर्यसम्पश्नसमर्थवार्तया मात्रा च मातृष्वसृभिश्च सादरम्। दत्तां सपर्यां वरमासनं च सा नादत्त पित्राप्रतिनन्दिता सती ।।८

अरुद्रभागं तमवेक्ष्य चाध्वरं पित्रा च देवे कृतहेलनं विभौ। अनादृता यज्ञसदस्यधीश्वरी चुकोप लोकानिव धक्ष्यती रुषा ।।९

जगर्ह सामर्षविपन्नया गिरा शिवद्विषं धूमपथश्रमस्मयम्। स्वतेजसा भूतगणान् समुत्थितान् निगृह्य देवी जगतोऽभिश‍ृण्वतः¹ ।।१०

श्रीदेव्युवाच