भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अमंगलरूप हैं ॥१४॥ अरे! महापुरुषोंके मन-मधुकर ब्रह्मानन्दमय रसका पान करनेकी इच्छासे जिनके चरणकमलोंका निरन्तर सेवन किया करते हैं और जिनके चरणारविन्द सकाम पुरुषोंको उनके अभीष्ट भोग भी देते हैं, उन विश्वबन्धु भगवान् शिवसे आप वैर करते हैं ॥१५॥

दोषान् परेषां हि गुणेषु साधवो
  गृह्णन्ति केचिन्न भवादृशा द्विज ।
गुणांश्च फल्गून् बहुलीकरिष्णवो
  महत्तमास्तेष्वविद्द्ववानघम् ॥१२
नाश्चर्यमेतद्यदसत्सु सर्वदा
  महद्विनिन्दा कुणपात्मवादिषु ।
सेर्ष्यं महापूरुषपादपांसुभि-
  र्निरस्ततेजःसु तदेव शोभनम् ॥१३
यद् द्व्यक्षरं नाम गिरेरितं नृणां
  सकृत्प्रसंगादघमाशु हन्ति तत् ।
पवित्रकीर्तिं तमलङ्घ्यशासनं
  भवानहो द्वेष्टि शिवं शिवेतरः ॥१४
यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-
  र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।
लोकस्य यद्वर्षति चाशिषोऽर्थिन-
  स्तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥१५
किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये
  ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।
तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-
  र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥१६
कर्णौ पिधाय निरयाद्यदकल्प ईशे
  धर्मावितर्यसृणिभिर्नृभिरस्यमाने ।
छिन्द्यात्प्रसह्य रुशतीमसतीं प्रभुश्चे-
  ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत्स धर्मः ॥१७

वे केवल नाममात्रके शिव हैं, उनका वेष अशिवरूप—अमंगलरूप है; इस बातको आपके सिवा दूसरे कोई देवता सम्भवतः नहीं जानते; क्योंकि जो भगवान् शिव श्मशानभूमिस्थ नरमुण्डोंकी माला, चिताकी भस्म और हड्डियाँ पहने, जटा बिखेरे, भूत-पिशाचोंके साथ श्मशानमें निवास करते हैं, उन्हींके चरणोंपरसे गिरे हुए निर्माल्यको ब्रह्मा आदि देवता अपने सिरपर धारण करते हैं ॥१६॥

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