भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 697, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 697

स्तज्जन्म धिग् यो महतामवद्यकृत् ॥२२ गोत्रं त्वदीयं भगवान् वृषध्वजो दाक्षायणीत्याह यदा सुदुर्मनाः । व्यपेतनर्मस्मितमाशु तद्ध्यहं व्युत्स्रक्ष्य एतत्कुणपं त्वदंगजम् ॥२३

पिताजी! हमारा ऐश्वर्य अव्यक्त है, आत्मज्ञानी महापुरुष ही उसका सेवन कर सकते हैं। आपके पास वह ऐश्वर्य नहीं है और यज्ञशालाओंमें यज्ञान्नसे तृप्त होकर प्राणपोषण करनेवाले कर्मठलोग उसकी प्रशंसा भी नहीं करते ॥२१॥ आप भगवान् शंकरका अपराध करनेवाले हैं। अतः आपके शरीरसे उत्पन्न इस निन्दनीय देहको रखकर मुझे क्या करना है। आप-जैसे दुर्जनसे सम्बन्ध होनेके कारण मुझे लज्जा आती है। जो महापुरुषोंका अपराध करता है, उससे होनेवाले जन्मको भी धिक्कार है ॥२२॥ जिस समय भगवान् शिव आपके साथ मेरा सम्बन्ध दिखलाते हुए मुझे हँसीमें 'दाक्षायणी' (दक्षकुमारी)-के नामसे पुकारेंगे, उस समय हँसीको भूलकर मुझे बड़ी ही लज्जा और खेद होगा। इसलिये उसके पहले ही मैं आपके अंगसे उत्पन्न इस शवतुल्य शरीरको त्याग दूँगी ॥२३॥

मैत्रेय उवाच

इत्यध्वरे दक्षमनूद्य शत्रुहन् क्षितावुदीचीं निषसाद शान्तवाक् । स्पृष्ट्वा जलं पीतदुकूलसंवृता निमील्य दृग्योगपथं समाविशत् ॥२४ कृत्वा समानावानिलौ जितासना सोदानमुत्थाप्य च नाभिचक्रतः । शनैर्हृदि स्थाप्य धियोरसि स्थितं कण्ठाद् भ्रुवोर्मध्यमनिन्दितानयत् ॥२५ एवं स्वदेहं महतां महीयसा मुहुः समारोपितमङ्कमादरात् । जिहासति दक्षरुषा मनस्विनी दधार गात्रेष्वनिलाग्निधारणाम् ॥२६ ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् । ददाह देहो हतकल्मषः सती सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥२७

ebook converter DEMO Watermarks*