श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 701, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंस देवदेवं परिचक्रमे विभुम् । मेने तदाऽऽत्मानमसंगरंहसा महीयसां तात सहः सहिष्णुम् ।।५
अन्वीयमानः स तु रुद्रपार्षदै- र्भृशं नदद्भिर्व्यनदत्सुभैरवम् । उद्यम्य शूलं जगदन्तकान्तकं स प्राद्रवद् घोषणभूषणाङ्घ्रिः ।।६
अथर्त्विजो यजमानः सदस्याः ककुभ्युदीच्यां प्रसमीक्ष्य रेणुम् । तमः किमेतत्कुत एतद्रजोऽभू- दिति द्विजा द्विजपत्न्यश्च दध्युः ।।७
वाता न वान्ति न हि सन्ति दस्यवः प्राचीनबर्हिर्जीवति होग्रदण्डः । गावो न काल्यन्त इदं कुतो रजो लोकोऽधुना किं प्रलयाय कल्पते ।।८
प्रसूतिमिश्राः स्त्रिय उद्विग्नचित्ता ऊचुर्विपाको वृजिनस्यैष तस्य । यत्पश्यन्तीनां दुहितॄणां प्रजेशः सुतां सतीमवद्ध्यावनागाम् ।।९
यस्त्वन्तकाले व्युप्तजटाकलापः स्वशूलसूच्यर्पितदिग्गजेन्द्रः । वितत्य नृत्यत्युदितास्त्रदोर्ध्वजा- नुच्चाट्टहासस्तनयित्नुभिन्नदिक् ।।१०
जब उसने हाथ जोड़कर पूछा, 'भगवन्! मैं क्या करूँ?' तो भगवान् भूतनाथने कहा—'वीर रुद्र! तू मेरा अंश है, इसलिये मेरे पार्षदोंका अधिनायक बनकर तू तुरंत ही जा और दक्ष तथा उसके यज्ञको नष्ट कर दे' ।।४।।
प्यारे विदुरजी! जब देवाधिदेव भगवान् शंकरने क्रोधमें भरकर ऐसी आज्ञा दी, तब वीरभद्र उनकी परिक्रमा करके चलनेको तैयार हो गये। उस समय उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि मेरे वेगका सामना करनेवाला संसारमें कोई नहीं है और मैं बड़े-से-बड़े वीरका भी वेग सहन कर सकता हूँ ।।५।। वे भयंकर सिंहनाद करते हुए एक अति कराल त्रिशूल हाथमें लेकर दक्षके यज्ञमण्डपकी ओर दौड़े। उनका त्रिशूल संसार-संहारक मृत्युका भी संहार करनेमें समर्थ था। भगवान् रुद्रके और भी बहुत-से सेवक गर्जना करते हुए उनके पीछे हो लिये। उस समय वीरभद्रके पैरोंके नूपुरादि आभूषण झनन-झनन बजते जाते थे ।।६।।
ebook converter DEMO Watermarks*