श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 713, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरते हुए लीलासे ही संसारकी रचना, पालन और संहार करते रहते हैं ॥४३॥ आपने ही धर्म और अर्थकी प्राप्ति करानेवाले वेदकी रक्षाके लिये दक्षको निमित्त बनाकर यज्ञको प्रकट किया है। आपकी ही बाँधी हुई ये वर्णाश्रमकी मर्यादाएँ हैं, जिनका नियमनिष्ठ ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं ॥४४॥ मंगलमय महेश्वर! आप शुभ कर्म करनेवालोंको स्वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करनेवालोंको घोर नरकोंमें डालते हैं। फिर भी किसी-किसी व्यक्तिके लिये इन कर्मोंका फल उलटा कैसे हो जाता है? ॥४५॥
जो महानुभाव आपके चरणोंमें अपनेको समर्पित कर देते हैं, जो समस्त प्राणियोंमें आपकी ही झाँकी करते हैं और समस्त जीवोंको अभेददृष्टिसे आत्मामें ही देखते हैं, वे पशुओंके समान प्रायः क्रोधके अधीन नहीं होते ॥४६॥
पृथग्धियः कर्मदृशो दुराशयाः परोदयेनार्पितहृद्रुजोऽनिशम् । परान् दुरुक्तैर्वितुदन्त्यरुन्तुदा- स्तान्मा वधीद्दैववधान् भवद्विधः ॥४७
यस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया दुरन्तया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः । कुर्वन्ति तत्र ह्यनुकम्पया कृपां न साधवो दैवबलात्कृते क्रमम् ॥४८
भवांस्तु पुंसः परमस्य मायया दुरन्तयास्पृष्टमतिः समस्तदृक् । तया हतात्मस्वनुकर्मचेत- स्स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हसि प्रभो ॥४९
कुर्वध्वरस्योद्धरणं हतस्य भो- स्त्वयासमाप्तस्य मनो प्रजापतेः । न यत्र भागं तव भागिनो ददुः कुयज्विनो येन मखो निनीयते ॥५०
जीवताद्यजमानोऽयं प्रपद्येताक्षिणी भगः । भृगोः श्मश्रूणि रोहन्तु पूष्णो दन्ताश्च पूर्ववत् ॥५१
देवानां भग्नगात्राणामृत्विजां चायुधाश्मभिः । भवतानुगृहीतानामाशु मन्योऽस्त्वनातुरम् ॥५२
एष ते रुद्र भागोऽस्तु यदुच्छिष्टोऽध्वरस्य वै । यज्ञस्ते रुद्र भागेन कल्पतामद्य यज्ञहन् ॥५३
जो लोग भेदबुद्धि होनेके कारण कर्मोंमें ही आसक्त हैं, जिनकी नीयत अच्छी नहीं है,
ebook converter DEMO Watermarks*