श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 723, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकपाला ऊचुः
दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं प्रत्यग्द्रष्टा दृश्यते येन दृश्यम् । माया ह्येषा भवदीया हि भूमन् यस्त्वं षष्ठः पंचभिर्भासि भूतैः ॥३७
योगेश्वरा ऊचुः
प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमुतस्त्वयि प्रभो विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग्य आत्मनः । अथापि भक्त्येशतयोपधावता- मनन्यवृत्त्यानुगृहाण वत्सल ॥३८
जगदुद्भवस्थितिलयेषु दैवतो बहुभिद्यमानगुणयाऽऽत्ममायया । रचितात्मभेदमत्तये स्वसंस्थया विनिवर्तितभ्रमगुणात्मने नमः ॥३९
ब्रह्मोवाच
नमस्ते श्रितसत्त्वाय धर्मादीनां च सूतये । निर्गुणाय च यत्काष्ठां नाहं वेदापरेऽपि च ॥४०
अग्निरुवाच
यत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजा हव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् । तं यज्ञियं पंचविधं च पंचभिः स्विष्टं यजुर्भिः प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥४१
लोकपालोंने कहा—अनन्त परमात्मन्! आप समस्त अन्तःकरणोंके साक्षी हैं, यह सारा जगत् आपके ही द्वारा देखा जाता है। तो क्या मायिक पदार्थोंको ग्रहण करनेवाली हमारी इन नेत्र आदि इन्द्रियोंसे कभी आप प्रत्यक्ष हो सके हैं? वस्तुतः आप हैं तो पंचभूतोंसे पृथक्; फिर भी पांचभौतिक शरीरोंके साथ जो आपका सम्बन्ध प्रतीत होता है, यह आपकी माया ही