श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 783, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपाय कीजिये। यदि आप पुत्रकी कामनासे यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे ।।३२।। जब सन्तानके लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरिका आवाहन किया जायगा, तब देवतालोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे ।।३३।। भक्त जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते हैं। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासकको फल भी मिलता है ।।३४।।
इस प्रकार राजा अंगको पुत्रप्राप्ति करानेका निश्चय कर ऋत्विजोंने पशुमें यज्ञरूपसे रहनेवाले श्रीविष्णुभगवान्के पूजनके लिये पुरोडाश नामक चरु समर्पण किया ।।३५।। अग्निमें आहुति डालते ही अग्निकुण्डसे सोनेके हार और शुभ्र वस्त्रोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्रमें सिद्ध खीर लिये हुए थे ।।३६।। उदारबुद्धि राजा अंगने याजकोंकी अनुमतिसे अपनी अंजलिमें वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नीको दे दिया ।।३७।। पुत्रहीना रानीने वह पुत्र प्रदायिनी खीर खाकर अपने पतिके सहवाससे गर्भ धारण किया। उससे यथासमय उसके एक पुत्र हुआ ।।३८।। वह बालक बाल्यावस्थासे ही अधर्मके वंशमें उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्युका अनुगामी था (सुनीथा मृत्युकी ही पुत्री थी); इसलिये वह भी अधार्मिक ही हुआ ।।३९।।
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः । हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ।।४० आक्रीडे क्रीडतो बालान् वयस्यानतिदारुणः । प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत् ।।४१ तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैर्विविधैर्नृपः । यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मनाः ।।४२ प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः । कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम् ।।४३ यतः पापीयसी कीर्तिरधर्मश्च महान्नृणाम् । यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः ।।४४ कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः । पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः ।।४५ कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् । निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्क्लेशनिवहा गृहाः ।।४६ एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहा- न्निशीथ उत्थाय महोदयोदयात् । अलब्धनिद्रोऽनुपलक्षितो नृभि- र्हित्वा गतो वेनसुवं प्रसुप्ताम् ।।४७
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