श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः । यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्वर्यादवरोहति ।।१६ राजन्नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः । रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्निह प्रेत्य च मोदते ।।१७ यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः । इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ।।१८ तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः । परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ।।१९
मुनियोंने कहा—राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उसपर ध्यान दीजिये। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्तिकी वृद्धि होगी ।।१४।। तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धिसे धर्मका आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकोंकी प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपदपर पहुँचा देता है ।।१५।। इसलिये वीरवर! प्रजाका कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्मके नष्ट होनेसे राजा भी ऐश्वर्यसे च्युत हो जाता है ।।१६।। जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकोल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है ।।१७।। जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम-धर्मोंका पालन करनेवाले पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं ।।१८-१९।। तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे । लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ।।२० तं सर्वलोकाममयज्ञसंग्रहं त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि ।।२१ यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि- र्वितन्यमानेन सुराः कला हरेः । स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ।।२२
वेन उवाच
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