श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 792, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसका कोई निवारण नहीं किया ॥३९-४०॥ फिर सोचा कि 'ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दीनोंकी उपेक्षा करनेसे उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़ेमेंसे जल बह जाता है ॥४१॥ फिर राजर्षि अंगका वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं' ॥४२॥ ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ ॥४३॥ वह कौएके समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबेके-से रंगके थे ॥४४॥ उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि 'मैं क्या करूँ?' तो ऋषियोंने कहा—'निषीद (बैठ जा)।' इसीसे वह 'निषाद' कहलाया ॥४५॥ उसने जन्म लेते ही राजा वेनके भयंकर पापोंको अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मोंमें रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगरमें न टिककर वन और पर्वतोंमें ही निवास करते हैं ॥४६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते निषादोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
१. प्रा० पा०—वै।
१. प्रा० पा०—भेजे। २. प्रा० पा०—देवं। ३. प्रा० पा०—तं। ४. प्रा० पा०—परिरक्षेत। ५. प्रा० पा०—सरित्स्वच्छ जला०। ६. प्रा० पा०—भयान्तरान्।