भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 798

अथ षोडशोऽध्यायः वन्दीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति

मैत्रेय उवाच

इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः । तुष्टुवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥१॥

नालं वयं ते महिमानुवर्णने यो देववर्योऽवततार मायया । वेनांगजातस्य च पौरुषाणि ते वाचस्पतीनामपि बभ्रमुर्धियः ॥२॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाराज पृथुने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृतका आस्वादन करके सूत आदि गायकलोग बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे मुनियोंकी प्रेरणासे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥१॥ 'आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं' जो अपनी मायासे अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेनके मृतक शरीरसे लिया है, किन्तु आपके पौरुषोंका वर्णन करनेमें साक्षात् ब्रह्मादिकी बुद्धि भी चकरा जाती है ॥२॥

अथाप्युदारश्रवसः पृथोर्हरेः कलावतारस्य कथामृतादृताः । यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताः श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥३

एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् । गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥४

एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः । काले काले यथाभागं लोकयोरुभयोर्हितम् ॥५

वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुंचति । समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः ॥६

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