श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुवर! प्रजाका करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देरतक विचार करते रहे। अन्तमें उन्हें अन्नाभावका कारण मालूम हो गया ।।१२।। 'पृथ्वीने स्वयं ही अन्न एवं औषधादिको अपने भीतर छिपा लिया है' अपनी बुद्धिसे इस बातका निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरके समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वीको लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया ।।१३।। उन्हें शस्त्र उठाये देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याधके पीछा करनेपर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौका रूप धारण करके भागने लगी ।।१४।।
यह देखकर महाराज पृथुकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे जहाँ-जहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुषपर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे ।।१५।। दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते ।।१६।। जिस प्रकार मनुष्यको मृत्युसे कोई नहीं बचा सकता, उसी प्रकार उसे त्रिलोकीमें वेनपुत्र पृथुसे बचानेवाला कोई भी न मिला। तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दुःखित चित्तसे पीछेकी ओर लौटी ।।१७।। और महाभाग पृथुजीसे कहने लगी—'धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शरणागतवत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियोंकी रक्षा करनेमें तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये ।।१८।। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्रीका वध आप कैसे कर सकेंगे? ।।१९।। स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उनपर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? ।।२०।।
मैं तो एक सुदृढ़ नौकाके समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधारपर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपनेको और अपनी प्रजाको जलके ऊपर कैसे रखेंगे?' ।।२१।।
पृथुरुवाच
वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्मुखीम् । भागं बर्हिषि या वृङ्क्ते न तनोति च नो वसु ।।२२ यवसं जग्ध्वनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पयः । तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ।।२३ त्वं खल्वोषधिबीजानि प्राक् सृष्टानि स्वयम्भुवा । न मुञ्चस्यात्मरुद्धानि मामवज्ञाय मन्दधीः ।।२४ अमूषां क्षुत्परीतानामार्तानां परिदेवितम् । शमयिष्यामि मद्बाणैर्भिन्नायास्तव मेदसा ।।२५ पुमान् योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः । भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः ।।२६ त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः ।