भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 808

हैं। प्रभो! जब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारनेको तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरणमें जाऊँ? ॥३०॥

य एतदादावसृजच्चराचरं स्वमाययाऽऽत्माश्रययावितर्क्यया । तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥३१ नूनं बतेशस्य समीहितं जनै- स्तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभिः । न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयद्- योऽनेक एकः परतश्च ईश्वरः ॥३२ सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि- र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तये१ नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥३३ स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद् भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो । संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला- दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः ॥३४ अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल । स वीरमूर्तिः समभूद्धराधरो यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥३५ नूनं जनैरीहितमीश्वराणा- मस्मद्विधैस्तद्गुणसर्गमायया । न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि२- स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः ॥३६

कल्पके आरम्भमें आपने अपने आश्रित रहनेवाली अनिर्वचनीया मायासे ही इस चराचर जगत्की रचना की थी और उस मायाके ही द्वारा आप इसका पालन करनेके लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणीको किस प्रकार मारना चाहते हैं? ॥३१॥ आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्माको रचकर उनसे विश्वकी रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्वर हैं, आपकी लीलाओंको अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय मायासे विक्षिप्त हो

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श्रीमद्भागवत महापुराण · पृष्ठ 808, कुल 1617 में से · BharatKosha