भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 81

परीक्षिते कथां वक्तुं सभायां संस्थिते शुके । सुधाकुम्भं गृहीत्वैव देवास्तत्र समागमन् ।।१३

शुकं नत्वावदन् सर्वे स्वकार्यकुशलाः सुराः । कथासुधां प्रयच्छस्व गृहीत्वैव सुधामिमाम् ।।१४

एवं विनिमये जाते सुधा राज्ञा प्रपीयताम् । प्रपास्यामो वयं सर्वे श्रीमद्भागवतामृतम् ।।१५

क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान् । ब्रह्मरातो विचार्यैवं तदा देवाञ्जहास ह ।।१६

अभक्तांस्तांश्च विज्ञाय न ददौ स कथामृतम् । श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्लभा ।।१७

सूतजी! आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइये जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करनेवालोंमें भी पवित्र हो; तथा जो भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करा दे ।।७।। चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक-से-अधिक स्वर्गीय सम्पत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवान्‌का योगिदुर्लभ नित्य वैकुण्ठधाम दे देते हैं ।।८।।

सूतजीने कहा—शौनकजी! तुम्हारे हृदयमें भगवान्‌का प्रेम है; इसलिये मैं विचारकर तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धान्तोंका निष्कर्ष सुनाता हूँ, जो जन्म-मृत्युके भयका नाश कर देता है ।।९।। जो भक्तिके प्रवाहको बढ़ाता है और भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताका प्रधान कारण है, मैं तुम्हें वह साधन बतलाता हूँ; उसे सावधान होकर सुनो ।।१०।। श्रीशुकदेवजीने कलियुगमें जीवोंके कालरूपी सर्पके मुखका ग्रास होनेके त्रासका आत्यन्तिक नाश करनेके लिये श्रीमद्भागवतशास्त्रका प्रवचन किया है ।।११।। मनकी शुद्धिके लिये इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है। जब मनुष्यके जन्म-जन्मान्तरका पुण्य उदय होता है, तभी उसे इस भागवतशास्त्रकी प्राप्ति होती है ।।१२।। जब शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌को यह कथा सुनानेके लिये सभामें विराजमान हुए, तब देवतालोग उनके पास अमृतका कलश लेकर आये ।।१३।। देवता अपना काम बनानेमें बड़े कुशल होते हैं; अतः यहाँ भी सबने शुकदेवमुनिको नमस्कार करके कहा; 'आप यह अमृत लेकर बदलेमें हमें कथामृतका दान दीजिये ।।१४।। इस प्रकार परस्पर विनिमय (अदला-बदली) हो जानेपर राजा परीक्षित् अमृतका पान करें और हम सब श्रीमद्भागवतरूप अमृतका पान करेंगे' ।।१५।। इस संसारमें कहाँ काँच और कहाँ महामूल्य मणि तथा कहाँ सुधा और कहाँ कथा? श्रीशुकदेवजीने (यह सोचकर) उस समय देवताओंकी हँसी उड़ा दी ।।१६।। उन्हें भक्तिशून्य (कथाका अनधिकारी) जानकर कथामृतका दान नहीं

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