भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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हैं ॥२।। तत्त्वदर्शी मुनियोंने इस लोक और परलोकमें मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये कृषि, अग्निहोत्र आदि बहुत-से उपाय निकाले और काममें लिये हैं ॥३।। उन प्राचीन ऋषियोंके बताये हुए उपायोंका इस समय भी जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भलीभाँति आचरण करता है, वह सुगमतासे अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है ॥४।। परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायोंका आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं ॥५।। राजन्! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिन धान्य आदिको उत्पन्न किया था, मैंने देखा कि यम-नियमादि व्रतोंका पालन न करनेवाले दुराचारीलोग ही उन्हें खाये जा रहे हैं ॥६।। लोकरक्षक! आप राजालोगोंने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरोंके समान हो गये हैं। इसीसे यज्ञके लिये ओषधियोंको मैंने अपनेमें छिपा लिया ॥७।। अब अधिक समय हो जानेसे अवश्य ही वे धान्य मेरे उदरमें जीर्ण हो गये हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्योंके बतलाये हुए उपायसे निकाल लीजिये ॥८।। लोकपालक वीर! यदि आपको समस्त प्राणियोंके अभीष्ट एवं बलकी वृद्धि करनेवाले अन्नकी आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र और दुहनेवालेकी व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़ेके स्नेहसे पिन्हाकर दूधके रूपमें आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी ॥९-१०।।

समां च कुरु मां राजन्देववृष्टं यथा पयः । अपर्तावपि भद्रं ते उपावर्तेत मे विभो ॥११ इति प्रियं हितं वाक्यं भुव आदाय भूपतिः । वत्सं कृत्वा मनुं पाणावदुहत्सकलौषधीः ॥१२ तथा परे च सर्वत्र सारमाददते बुधाः । ततोऽन्ये१ च यथाकामं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥१३ ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम । वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि ॥१४ कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् । हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥१५ दैतेया दानवा वत्सं प्रह्रादमसुरर्षभम् । विधाय्यादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥१६ गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः । वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं२ मधु सौभाग्यम्३ ॥१७ वत्सेन पितरोऽर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत । आमपात्रे महाभागाः श्रद्धया श्राद्धदेवताः ॥१८ प्रकल्प्य वत्सं कपिलं सिद्धाः सङ्कल्पनामयीम् । सिद्धिं नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादयः ॥१९