श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरिके शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्रके प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये ।।३३।। आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ—इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाताके बिगाड़े हुए कामको बनानेका विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोधमें भरकर भयंकर मोहमें फँस जाता है ।।३४।। बस, इस यज्ञको बंद कीजिये। इसीके कारण इन्द्रके चलाये हुए पाखण्डोंसे धर्मका नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओंमें बड़ा दुराग्रह होता है ।।३५।। जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़ेको चुराकर आपके यज्ञमें विघ्न डाल रहा था, उसीके रचे हुए इन मनोहर पाखण्डोंकी ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है ।।३६।।
भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो धर्मं जनानां समयानुरूपम् । वेनापचारादवलुप्तमद्य तद्देहतो विष्णुकलासि वैन्य ।।३७ स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि । ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ।।३८
मैत्रेय उवाच
इत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पतिः । तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ।।३९ कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे । वरानददुस्ते वरदा ये तद्वर्हिषि तर्पिताः ।।४० विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः । आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः ।।४१ त्वयाऽऽहूता महाबाहो सर्व एव समागताः । पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवाः ।।४२
आप साक्षात् विष्णुके अंश हैं। वेनके दुराचारसे धर्म लुप्त हो रहा था, उस समयोचित धर्मकी रक्षाके लिये ही आपने उसके शरीरसे अवतार लिया है ।।३७।। अतः प्रजापालक पृथुजी! अपने इस अवतारका उद्देश्य विचारकर आप भृगु आदि विश्वरचयिता मुनीश्वरोंका संकल्प पूर्ण कीजिये। यह प्रचण्ड पाखण्ड-पथरूप इन्द्रकी माया अधर्मकी जननी है। आप इसे नष्ट कर डालिये' ।।३८।।
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