भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 830

अथैकविंशोऽध्यायः महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश

मैत्रेय उवाच

मौक्तिकैः कुसुमस्त्रग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणैः । महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै ॥१॥

चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् । पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिर्चितम् ॥२॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय महाराज पृथुका नगर सर्वत्र मोतियोंकी लड़ियों, फूलोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों, सोनेके दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपोंसे सुशोभित था ॥१॥ उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजेके जलसे सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवांकुर, खील और दीपक आदि मांगलिक द्रव्योंसे सजाया गया था ॥२॥

सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम् । तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलंकृतम् ॥३॥ प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमंगलैः । अभीयुर्मृष्टकन्याश्च मृष्टकुण्डलमण्डिताः ॥४॥ शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम् । विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः ॥५॥ पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः । पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः ॥६॥ स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः । कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम् ॥७॥

सूत उवाच

तदादिराजस्य^१ यशो विजृम्भितं