भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 843, कुल 1617 में से

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पृष्ठ 843

कल्याणकी दृष्टिसे बड़ी अच्छी बात पूछी है। सच है, साधुपुरुषोंकी बुद्धि ऐसी ही हुआ करती है ।।१८।।

संगमः खलु साधूनामुभयेषां च सम्मतः। यत्सम्भाषणसम्पश्नः सर्वेषां वितनोति शम् ।।१९ अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः पादारविन्दस्य गुणानुवादने । रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ।।२० शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां क्षेमस्य सध्रयग्विम्शृशेषु हेतुः । असङ्ग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि दृढा रतिर्ब्रह्मणि१ निर्गुणे च या ।।२१ सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया । योगेश्वरोपासनया च नित्यं पुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ।।२२ अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च । विविक्तरुच्या परितोष आत्मन् विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ।।२३ अहिंसया पारमहंस्यचर्यया स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना । यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ।।२४ हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर- गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया । भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ।।२५

सत्पुरुषोंका समागम श्रोता और वक्ता दोनोंको ही अभिमत होता है, क्योंकि उनके प्रश्नोत्तर सभीका कल्याण करते हैं ॥१९॥ राजन्! श्रीमधुसूदन भगवान्‌के चरणकमलोंके गुणानुवादमें अवश्य ही आपकी अविचल प्रीति है। हर किसीको इसका प्राप्त होना बहुत कठिन है और प्राप्त हो जानेपर यह हृदयके भीतर रहनेवाले उस वासनारूप मलको सर्वथा

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