श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 850, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंहितमें लगा देते थे तथा सबपर अपना प्रभाव जमाये रखते थे ।।५४-५६।। वे तेजमें अग्निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वीके समान क्षमाशील और स्वर्गके समान मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले थे ।।५७।। समय-समयपर प्रजाजनोंको तृप्त करनेके लिये वे मेघके समान उनके अभीष्ट अर्थोंको खुले हाथसे लुटाते रहते थे। वे समुद्रके समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरुके समान धैर्यवान् भी थे ।।५८।।
धर्मराडिव शिक्षायामाश्चर्ये हिमवानिव । कुबेर इव कोशाढ्यो गुप्तार्थो वरुणो यथा ।।५९ मातरिश्वैव सर्वात्मा बलेन सहसौजसा । अविषह्यतया देवो भगवान् भूतराडिव ।।६० कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ।।६१ बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः । भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यः परोद्यमे ।।६२ कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ।।६३
महाराज पृथु दुष्टोंके दमन करनेमें यमराजके समान, आश्चर्यपूर्ण वस्तुओंके संग्रहमें हिमालयके समान, कोशकी समृद्धि करनेमें कुबेरके समान और धनको छिपानेमें वरुणके समान थे ।।५९।। शारीरिक बल, इन्द्रियोंकी पटुता तथा पराक्रममें सर्वत्र गतिशील वायुके समान और तेजकी असह्यतामें भगवान् शंकरके समान थे ।।६०।। सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे ।।६१।। ब्रह्मविचारमें बृहस्पति, इन्द्रियजयमें साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भगवद्भक्तोंकी भक्ति, लज्जा, विनय, शील एवं परोपकार आदि गुणोंमें अपने ही समान (अनुपम) थे ।।६२।। लोग त्रिलोकीमें सर्वत्र उच्च स्वरसे उनकी कीर्तिका गान करते थे, इससे वे स्त्रियोंतकके कानोंमें वैसे ही प्रवेश पाये हुए थे जैसे सत्पुरुषोंके हृदयमें श्रीराम ।।६३।।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते द्वाविंशोऽध्यायः ।।२२।।
१. प्रा० पा०—अधन्या। २. प्रा० पा०—श्वराश्वराः। ३. प्रा० पा०—द्रुमाश्रैते। ४. प्रा० पा०—वै। १. प्रा० पा०—मति।