भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 854

इस प्रकार भगवदुपासनासे अन्तःकरण शुद्ध-सात्त्विक हो जानेपर निरन्तर भगवच्चिन्तनके प्रभावसे प्राप्त हुई इस अनन्य भक्तिसे उन्हें वैराग्यसहित ज्ञानकी प्राप्ति हुई और फिर उस तीव्र ज्ञानके द्वारा उन्होंने जीवके उपाधिभूत अहंकारको नष्ट कर दिया, जो सब प्रकारके संशय-विपर्ययका आश्रय है ॥११॥ इसके पश्चात् देहात्मबुद्धिकी निवृत्ति और परमात्मस्वरूप श्रीकृष्णकी अनुभूति होनेपर अन्य सब प्रकारकी सिद्धि आदिसे भी उदासीन हो जानेके कारण उन्होंने उस तत्त्वज्ञानके लिये भी प्रयत्न करना छोड़ दिया, जिसकी सहायतासे पहले अपने जीवकोशका नाश किया था, क्योंकि जबतक साधकको योगमार्गके द्वारा श्रीकृष्ण-कथामृतमें अनुराग नहीं होता, तबतक केवल योगसाधनासे उसका मोहजनित प्रमाद दूर नहीं होता—भ्रम नहीं मिटता ॥१२॥

एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि । ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वं कलेवरम् ॥१३

सम्पीड्य पायुं पाष्णिभ्यां वायुमुत्सारयञ्छनैः । नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुरःकण्ठशीर्षणि ॥१४

उत्सर्पयंस्तु तं मूर्ध्नि क्रमेणावेश्य निःस्पृहः । वायुं१वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥१५

खान्यकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः । क्षितिमम्भसि तत्तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥१६

इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्भवम् । भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥१७

तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् । तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् । ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभुः२ ॥१८

अर्चिर्नाम महाराज्ञी तत्पत्न्यनुगता वनम् । सुकुमार्यतदर्हा च यत्पद्भ्यां स्पर्शनं भुवः ॥१९

अतीव भर्तुर्व्रतधर्मनिष्ठया शुश्रूषया चारुषदेहयात्रया३ ।

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