भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 866

शारीरिक शक्तिस्वरूप वायु (प्राण) हैं; आपको नमस्कार है ॥३९॥ आप ही अपने गुण शब्दके द्वारा—समस्त पदार्थोंका ज्ञान करानेवाले तथा बाहर-भीतरका भेद करनेवाले आकाश हैं तथा आप ही महान् पुण्योंसे प्राप्त होनेवाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है ॥४०॥ आप पितृलोककी प्राप्ति करानेवाले प्रवृत्ति-कर्मरूप और देवलोककी प्राप्तिके साधन निवृत्ति-कर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्मके फलस्वरूप दुःखदायक मृत्यु हैं; आपको नमस्कार है ॥४१॥ नाथ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योगके अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं; आप सब प्रकारकी कामनाओंकी पूर्तिके कारण, साक्षात् मन्त्रमूर्ति और महान् धर्मस्वरूप हैं; आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होनेवाली नहीं है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥४२॥ आप ही कर्ता, करण और कर्म—तीनों शक्तियोंके एकमात्र आश्रय हैं; आप ही अहंकारके अधिष्ठाता रुद्र हैं; आप ही ज्ञान और क्रियास्वरूप हैं तथा आपसे ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—चार प्रकारकी वाणीकी अभिव्यक्ति होती है; आपको नमस्कार है ॥४३॥

प्रभो! हमें आपके दर्शनोंकी अभिलाषा है; अतः आपके भक्तजन जिसका पूजन करते हैं और जो आपके निजजनोंको अत्यन्त प्रिय है, अपने उस अनूप रूपकी आप हमें झाँकी कराइये। आपका वह रूप अपने गुणोंसे समस्त इन्द्रियोंको तृप्त करनेवाला है ॥४४॥

स्निग्धप्रावृड्घनश्यामं सर्वसौन्दर्यसंग्रहम् । चार्रायतचतुर्बाहुं सुजातरुचिराननम् ॥४५

पद्मकोशपलाशाक्षं सुन्दरभ्रु सुनासिकम् । सुद्विजं सुकपोलास्यं समकर्णविभूषणम् ॥४६

प्रीतिप्रहसितापांगमलकैरुपशोभितम् । लसत्पङ्कजकिंजल्कदुकूलं मृष्टकुण्डलम् ॥४७

स्फुरत्किरीटवलयहारनूपुरमेखलम् । शङ्खचक्रगदापद्ममालामण्युत्तमांग्द्धिमत् ॥४८

सिंहस्कन्धत्विषो बिभ्रत्सौभगग्रीवकौस्तुभम् । श्रियानपायिन्या क्षिप्तनिकषाश्मोरसोल्लसत् ॥४९

पूररेचकसंविग्नवलिवल्गुदलोदरम् । प्रतिसंक्रामयद्विश्वं नाभ्याऽऽवर्तगभीरया ॥५०

श्यामश्रोण्यधिरोचिष्णुर्दुकूलस्वर्णमेखलम् ।

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