भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 878

इत्थं पुरंजनं नारी याचमानमधीरवत् । अभ्यनन्दत तं वीरं हसन्ती वीर मोहिता ॥३२ न विदाम वयं सम्यक्कर्तारं पुरुषर्षभ । आत्मनश्च परस्यापि गोत्रं नाम च यत्कृतम् ॥३३ इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम न ततः परम् । येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मनः ॥३४ एते सखायः सख्यो मे नरा नार्यश्च मानद । सुप्तायां मयि जागर्ति नागोऽयं पालयन् पुरीम् ॥३५ दिष्ट्याऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान् कामानभीप्ससे । उद्धरिष्यामि तांस्तेऽहं स्वबन्धुभिररिन्दम ॥३६ इमां त्वमधितिष्ठस्व पुरीं नवमुखीं विभो । मयोपनीतान् गृह्णानः कामभोगान् शतं समाः ॥३७ कं नु त्वदन्यं रमये ह्यरतिज्ञमकोविदम् । असम्परायाभिमुखमश्वस्तनविदं पशुम् ॥३८ धर्मो ह्यत्रार्थकामौ च प्रजानन्दोऽमृतं यशः । लोका विशोका विरजा यान् न केवलिनो विदुः ॥३९ पितृदेवर्षिमर्त्यानां भूतानामात्मनश्च ह । क्षेम्यं१ वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन् यद् गृहाश्रमः ॥४० का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम् । न वृणीत प्रियं२ प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम्३ ॥४१

श्रीनारदजीने कहा—वीरवर! जब राजा पुरंजनने अधीर-से होकर इस प्रकार याचना की, तब उस बालाने भी हँसते हुए उसका अनुमोदन किया। वह भी राजाको देखकर मोहित हो चुकी थी ।।३२।। वह कहने लगी, 'नरश्रेष्ठ! हमें अपने उत्पन्न करनेवालेका ठीक-ठीक पता नहीं है और न हम अपने या किसी दूसरेके नाम या गोत्रको ही जानती हैं ।।३३।। वीरवर! आज हम सब इस पुरीमें हैं—इसके सिवा मैं और कुछ नहीं जानती; मुझे इसका भी पता नहीं है कि हमारे रहनेके लिये यह पुरी किसने बनायी है ।।३४।। प्रियवर! ये पुरुष मेरे सखा और स्त्रियाँ मेरी सहेलियाँ हैं तथा जिस समय मैं सो जाती हूँ, यह सर्प जागता हुआ इस पुरीकी रक्षा करता रहता है ।।३५।। शत्रुदमन! आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये सौभाग्यकी बात है। आपका मंगल हो। आपको विषय-भोगोंकी इच्छा है, उसकी पूर्तिके लिये मैं अपने साथियोंसहित सभी प्रकारके भोग प्रस्तुत करती रहूँगी ।।३६।। प्रभो! इस नौ द्वारोंवाली पुरीमें मेरे प्रस्तुत किये हुए इच्छित भोगोंको भोगते हुए आप सैकड़ों वर्षोंतक निवास

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