श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यंगे रथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत् ॥१५
क्व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे । या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे ॥१६
रामा ऊचुः
नरनाथ न जानीमस्त्वत्प्रिया यद्व्यवस्यति । भूतले निरवस्तारे शयानां पश्य शत्रुहन् ॥१७
नारद उवाच
पुरंजनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि । तत्संगोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ ॥१८
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा हृदयेन विदूयता । प्रेयस्याः स्नेहसंरम्भलिंगमात्मनि नाभ्यगात् ॥१९
इस प्रकार वहाँ खरगोश, सूअर, भैंसे, नीलगाय, कृष्णमृग, साही तथा और भी बहुत-से मेध्य पशुओंका वध करते-करते राजा पुरंजन बहुत थक गया ।।१०।। तब वह भूख-प्याससे अत्यन्त शिथिल हो वनसे लौटकर राजमहलमें आया। वहाँ उसने यथायोग्य रीतिसे स्नान और भोजनसे निवृत्त हो, कुछ विश्राम करके थकान दूर की ।।११।। फिर गन्ध, चन्दन और माला आदिसे सुसज्जित हो सब अंगोंमें सुन्दर-सुन्दर आभूषण पहने। तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी ।।१२।। वह भोजनादिसे तृप्त, हृदयमें आनन्दित, मदसे उन्मत्त और कामसे व्यथित होकर अपनी सुन्दरी भार्याको ढूँढ़ने लगा; किन्तु उसे वह कहीं भी दिखायी न दी ।।१३।।
प्राचीनबर्हि! तब उसने चित्तमें कुछ उदास होकर अन्तःपुरकी स्त्रियोंसे पूछा, ‘सुन्दरियो! अपनी स्वामिनीके सहित तुम सब पहलेकी ही तरह कुशलसे हो न? ।।१४।। क्या कारण है आज इस घरकी सम्पत्ति पहले-जैसी सुहावनी नहीं जान पड़ती? घरमें माता अथवा पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहियेके रथके समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान् दीन पुरुषोंके समान रहना पसंद करेगा ।।१५।। अतः बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है, जो दुःख-समुद्रमें डूबनेपर मेरी विवेक-बुद्धिको पद-पदपर जाग्रत् करके मुझे उस संकटसे उबार लेती है?’ ।।१६।।
स्त्रियोंने कहा—नरनाथ! मालूम नहीं आज आपकी प्रियाने क्या ठानी है। शत्रुदमन! देखिये, वे बिना बिछौनेके पृथ्वीपर ही पड़ी हुई हैं ।।१७।।
श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उस स्त्रीके संगसे राजा पुरंजनका विवेक नष्ट हो चुका