भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 89

यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना । तत्फलं लभते सम्यक्कलो केशवकीर्तनात् ॥६८ एकाकारं कलिं दृष्ट्वा सारवत्सारनीरसम् । विष्णुरातः स्थापितवान् कलिजानां सुखाय च ॥६९ कुकर्माचरणात्सारः सर्वतो निर्गतोऽधुना । पदार्थः संस्थिता भूमौ बीजहीनास्तुषा यथा ॥७० विप्रैर्भागवती वार्ता गेहे गेहे जने जने । कारिता कणलोभेन कथासारस्ततो गतः ॥७१ अत्युग्रभूरिकर्माणो नास्तिका रौरवा जनाः । तेऽपि तिष्ठन्ति तीर्थेषु तीर्थसारस्ततो गतः ॥७२ कामक्रोधमहालोभतृष्णाव्याकुलचेतसः । तेऽपि तिष्ठन्ति तपसि तपःसारस्ततो गतः ॥७३ मनसश्चाजयाल्लोभाद्दम्भात्पाखण्डसंश्रयात् । शास्त्रानभ्यसनाच्चैव ध्यानयोगफलं गतम् ॥७४ पण्डितास्तु कलत्रेण रमन्ते महिषा इव । पुत्रस्योत्पादने दक्षा अदक्षा मुक्तिसाधने ॥७५ न हि वैष्णवता कुत्र सम्प्रदायपुरःसरा । एवं प्रलयतां प्राप्तो वस्तुसारः स्थले स्थले ॥७६

नारदजीने कहा—बाले! यदि तुमने पूछा है तो प्रेमसे सुनो; कल्याणी! मैं तुम्हें सब बताऊँगा और तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा ॥६५॥ जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण इस भूलोकको छोड़कर अपने परमधामको पधारे उसी दिनसे यहाँ सम्पूर्ण साधनोंमें बाधा डालनेवाला कलियुग आ गया ॥६६॥ दिग्विजयके समय राजा परीक्षित्की दृष्टि पड़नेपर कलियुग दीनके समान उनकी शरणमें आया। भ्रमरके समान सारग्राही राजाने यह निश्चय किया कि इसका वध मुझे नहीं करना चाहिये ॥६७॥ क्योंकि जो फल तपस्या, योग एवं समाधिसे भी नहीं मिलता, कलियुगमें वही फल श्रीहरिकीर्तनसे ही भलीभाँति मिल जाता है ॥६८॥ इस प्रकार सारहीन होनेपर भी उसे इस एक ही दृष्टिसे सारयुक्त देखकर उन्होंने कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंके सुखके लिये ही इसे रहने दिया था ॥६९॥

इस समय लोगोंके कुकर्ममें प्रवृत्त होनेके कारण सभी वस्तुओंका सार निकल गया है और पृथ्वीके सारे पदार्थ बीजहीन भूसीके समान हो गये हैं ॥७०॥ ब्राह्मण केवल अन्न-धनादिके लोभवश घर-घर एवं जन-जनको भागवतकी कथा सुनाने लगे हैं, इसलिये कथाका सार चला गया ॥७१॥ तीर्थोंमें नाना प्रकारके अत्यन्त घोर कर्म करनेवाले, नास्तिक और नारकी पुरुष भी रहने लगे हैं; इसलिये तीर्थोंका भी प्रभाव जाता रहा ॥७२॥ जिनका चित्त ebook converter DEMO Watermarks*