भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 913, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 913

रहा है, वह दूब आदि छोटे-छोटे अंकुरोंको चर रहा है। उसके कान भौरोंके मधुर गुंजारमें लग रहे हैं। उसके सामने ही दूसरे जीवोंको मारकर अपना पेट पालनेवाले भेड़िये ताक लगाये खड़े हैं और पीछेसे शिकारी व्याधने बींधनेके लिये उसपर बाण छोड़ दिया है। परन्तु हरिन इतना बेसुध है कि उसे इसका कुछ भी पता नहीं है।' एक बार इस हरिनकी दशापर विचार करो ।।५३।।

राजन्! इस रूपकका आशय सुनो। यह मृतप्राय हरिन तुम्हीं हो, तुम अपनी दशापर विचार करो। पुष्पोंकी तरह ये स्त्रियाँ केवल देखनेमें सुन्दर हैं, इन स्त्रियोंके रहनेका घर ही पुष्पवाटिका है। इसमें रहकर तुम पुष्पोंके मधु और गन्धके समान क्षुद्र सकाम कर्मोंके फलरूप, जीभ और जननेन्द्रियको प्रिय लगनेवाले भोजन तथा स्त्रीसंग आदि तुच्छ भोगोंको ढूँढ़ रहे हो। स्त्रियोंसे घिरे रहते हो और अपने मनको तुमने उन्हींमें फँसा रखा है। स्त्री-पुत्रोंका मधुर भाषण ही भौरोंका मधुर गुंजार है, तुम्हारे कान उसीमें अत्यन्त आसक्त हो रहे हैं। सामने ही भेड़ियोंके झुंडके समान कालके अंश दिन और रात तुम्हारी आयुको हर रहे हैं, परन्तु तुम उनकी कुछ भी परवा न कर गृहस्थीके सुखोंमें मस्त हो रहे हो। तुम्हारे पीछे गुप-चुप लगा हुआ शिकारी काल अपने छिपे हुए बाणसे तुम्हारे हृदयको दूरसे ही बींध डालना चाहता है ।।५४।।

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्त- श्रितं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते । जह्यंगनाश्रममसत्तमयूथगाथं प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ।।५५

राजोवाच

श्रुतमान्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत । नैतज्जानन्त्युपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ।।५६

संशयोऽत्र तु मे विप्र संछिन्नस्तत्कृतो महान् । ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ।।५७

कर्माण्यारहते येन पुमानिह विहाय तम् । अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ।।५८

इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह । कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ।।५९

नारद उवाच ebook converter DEMO Watermarks*