भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 924

करते हैं। वेद आपके उदार गुण और नामोंका निरूपण करते हैं। आपका वेग मन और वाणीके वेगसे भी बढ़कर है तथा आपका स्वरूप सभी इन्द्रियोंकी गतिसे परे है। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं ।।२२।। आप अपने स्वरूपमें स्थित रहनेके कारण नित्य शुद्ध और शान्त हैं, मनरूप निमित्तके कारण हमें आपमें यह मिथ्या द्वैत भास रहा है। वास्तवमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये आप मायाके गुणोंको स्वीकार करके ही ब्रह्मा, विष्णु और महादेवरूप धारण करते हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं ।।२३।। आप विशुद्ध सत्त्वस्वरूप हैं, आपका ज्ञान संसारबन्धनको दूर कर देता है। आप ही समस्त भागवतोंके प्रभु वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, आपको नमस्कार है ।।२४।। आपकी ही नाभिसे ब्रह्माण्डरूप कमल प्रकट हुआ था, आपके कण्ठमें कमलकुसुमोंकी माला सुशोभित है तथा आपके चरण कमलके समान कोमल हैं; कमलनयन! आपको नमस्कार है ।।२५।। आप कमलकुसुमकी केसरके समान स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त भूतोंके आश्रयस्थान हैं तथा सबके साक्षी हैं; हम आपको नमस्कार करते हैं ।।२६।।

नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे । वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ।।२४

नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने । नमः कमलपादाय नमस्ते कमलेक्षण ।।२५

नमः कमलकिंजल्कपिशंगामलवाससे । सर्वभूतनिवासाय नमोऽयुङ्क्ष्महि साक्षिणे ।।२६

रूपं भगवता त्वेतदशेषक्लेशसंक्षयम् । आविष्कृतं नः क्लिष्टानां किमन्यदनुकम्पितम् ।।२७

एतावत्त्वं हि विभुभिर्भाव्यं दीनेषु वत्सलैः । यदनुस्मर्यते काले स्वबुद्ध्याभद्ररन्धन ।।२८

येनोपशान्तिर्भूतानां क्षुल्लकानामपीहताम् । अन्तर्हितोऽन्तर्हृदये कस्मान्नो वेद नाशिषः ।।२९

असावेव वरोऽस्माकमीप्सितो जगतः पते । प्रसन्नो भगवान् येषामपवर्गगुरुर्गतिः ।।३०

वरं वृणीमहेऽथापि१ नाथ त्वत्परतः परात् ।

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