श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 927, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैत्रेय उवाच
इति प्रचेतोभिरभिष्टुतो हरिः प्रीतस्तथेत्याह शरण्यवत्सलः । अनिच्छतां यानमतृप्तचक्षुषां ययौ स्वधामानपवर्गवीर्यः ॥४३ अथ निर्याय सलिात्प्रचेतस उदन्वतः । वीक्ष्याकुप्यन्द्रुमैश्छन्नां गां द्यां रोद्धुमिवोच्छ्रितैः ॥४४ ततोऽग्निमारुतौ राजन्नमुञ्चन्मुखतो रुषा । महीं निर्वीरुधं कर्तुं संवर्तक इवात्यये ॥४५ भस्मसात्क्रियमाणांस्तान्द्रुमान् वीक्ष्य पितामहः । आगतः शमयामास पुत्रान् बर्हिष्मतो नयैः ॥४६ तत्रावशिष्टा ये वृक्षा भीता दुहितरं तदा । उज्जहुस्ते प्रचेतोभ्य उपदिष्टाः स्वयम्भुवा ॥४७ ते च ब्रह्मण आदेशान्मारिषामुपयेमिरे । यस्यां महदवज्ञानादजन्यजनयोनिजः ॥४८ चाक्षुषे त्वन्तरे प्राप्ते प्राक्सर्गे कालविद्रुते । यः ससर्ज प्रजा इष्टाः स दक्षो दैवचोदितः ॥४९ यो जायमानः सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा । स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन् ॥५० तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च । युयोज युयुजेऽन्यांश्च स वै सर्वप्रजापतीन् ॥५१
आप सर्वत्र समान शुद्ध स्वरूप और परम पुरुष हैं। आप सत्त्वमूर्ति भगवान् वासुदेवको हम नमस्कार करते हैं ॥४२॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! प्रचेताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर शरणागतवत्सल श्रीभगवान्ने प्रसन्न होकर कहा—'तथास्तु'। अप्रतिहतप्रभाव श्रीहरिकी मधुर मूर्तिके दर्शनोंसे अभी प्रचेताओंके नेत्र तृप्त नहीं हुए थे, इसलिये वे उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे; तथापि वे अपने परमधामको चले गये ॥४३॥ इसके पश्चात् प्रचेताओंने समुद्रके जलसे बाहर निकलकर देखा कि सारी पृथ्वीको ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंने ढक दिया है, जो मानो स्वर्गका मार्ग रोकनेके लिये ही इतने बढ़ गये थे। यह देखकर वे वृक्षोंपर बड़े कुपित हुए ॥४४॥ तब उन्होंने पृथ्वीको वृक्ष, लता आदिसे रहित कर देनेके लिये अपने मुखसे प्रचण्ड वायु और अग्निको छोड़ा, जैसे कालाग्निरुद्र प्रलयकालमें छोड़ते हैं ॥४५॥ जब ब्रह्माजीने देखा कि वे सारे
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