श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 930, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर—जहाँ जाजलि मुनिने सिद्धि प्राप्त की थी—जा पहुँचे और जिससे 'समस्त भूतोंमें एक ही आत्मतत्त्व विराजमान है' ऐसा ज्ञान होता है, उस आत्मविचाररूप ब्रह्मसत्रका संकल्प करके बैठ गये ॥२॥
उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टिको वशमें किया तथा शरीरको निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसनको जीतकर चित्तको विशुद्ध परब्रह्ममें लीन कर दिया। ऐसी स्थितिमें उन्हें देवता और असुर दोनोंके ही वन्दनीय श्रीनारदजीने देखा ॥३॥
नारदजीको आया देख प्रचेतागण खड़े हो गये और प्रणाम करके आदर-सत्कारपूर्वक देश-कालानुसार उनकी विधिवत् पूजा की। जब नारदजी सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे कहने लगे ॥४॥
प्रचेताओैंने कहा—देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्यसे हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन्! सूर्यके समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोकसे समस्त जीवोंको अभय-दान देनेके लिये ही होता है ॥५॥
प्रभो! भगवान् शंकर और श्रीविष्णुभगवान्ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थीमें आसक्त रहनेके कारण हमलोग प्रायः भूल गये हैं ॥६॥
अतः आप हमारे हृदयोंमें उस परमार्थतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले अध्यात्मज्ञानको फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमतासे ही इस दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायँ ॥७॥
मैत्रेय उवाच
इति प्रचेतसां पृष्टो भगवान्नारदो मुनिः । भगवत्युत्तमश्लोक आविष्टात्माब्रवीन्नृपान् ॥८
नारद उवाच
तज्जन्म तानि कर्माणि तदायूस्तन्मनो वचः । नृणां येनेह१ विश्वात्मा सेव्यते हरिरीश्वरः ॥९
किं जन्मभिस्त्रिभिर्वेह२ शौक्लसावित्रयाज्ञिकैः३ । कर्मभिर्वा त्रयीप्रोक्तैः पुंसोऽपि विबुधायुषा ॥१०
श्रुतेन तपसा वा किं वचोभिश्चित्तवृत्तिभिः । बुद्ध्या वा किं निपुणया बलेनेन्द्रियराधसा४ ॥११
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