श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 935, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वानां दिदृक्षुः प्रययौ ज्ञातीनां निर्वृताशयः ॥ ३०
एतद्यः शृणुयाद्राजन् राज्ञां हर्यर्पितात्मनाम् । आयुर्धनं यशः स्वस्ति गतिमैश्वर्यमाप्नुयात् ॥ ३१
राजन्! इधर श्रीमैत्रेयजीके मुखसे यह भगवद्-गुणानुवादयुक्त पवित्र कथा सुनकर विदुरजी प्रेममग्न हो गये, भक्तिभावका उद्वेक होनेसे उनके नेत्रोंसे पवित्र आँसुओंकी धारा बहने लगी तथा उन्होंने हृदयमें भगवच्चरणोंका स्मरण करते हुए अपना मस्तक मुनिवर मैत्रेयजीके चरणोंपर रख दिया ॥२८॥
विदुरजी कहने लगे—महायोगिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं। आज आपने मुझे अज्ञानान्धकारके उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनोंके सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं ॥२९॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेयजीको उपर्युक्त कृतज्ञता सूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुरजीने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनोंसे मिलनेके लिये वे हस्तिनापुर चले गये ॥३०॥ राजन्! जो पुरुष भगवान्के शरणागत परमभागवत राजाओंका यह पवित्र चरित्र सुनेगा, उसे दीर्घ आयु, धन, सुयश, क्षेम, सद्गति और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी ॥३१॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रचेतसोपाख्यानं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥३१॥
१. प्रा० पा०—भिवाद्य च। २. प्रा० पा०—प्रायो नः। ३. प्रा० पा०—ध्यात्मं ज्ञानं।
१. प्रा० पा०—येन हि। २. प्रा० पा०—भिस्त्रिभिर्वेदैः। ३. प्रा० पा०—शुक्लसा०। ४. प्रा० पा०—रोधसा। ५. प्रा० पा०—रात्मपदः प्रि०।
१. प्रा० पा०—मनुसरतस्तदर्थि०। २. प्रा० पा०—यत्सुपूर्णः। ३. प्रा० पा०—नृप सम्मतम्।
१. प्रा० पा०—भावाश्रु०।
॥ इति चतुर्थः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥