श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदिदेव स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीको निरन्तर इस गुणमय प्रपंचकी वृद्धिका ही विचार रहता है। वे सारे संसारके जीवोंका अभिप्राय जानते रहते हैं। जब उन्होंने प्रियव्रतकी ऐसी प्रवृत्ति देखी, तब वे मूर्तिमान् चारों वेद और मरीचि आदि पार्षदोंको साथ लिये अपने लोकसे उतरे ।।७।। आकाशमें जहाँ-तहाँ विमानोंपर चढ़े हुए इन्द्रादि प्रधान-प्रधान देवताओंने उनका पूजन किया तथा मार्गमें टोलियाँ बाँधकर आये हुए सिद्ध, गन्धर्व, साध्य, चारण और मुनिजनने स्तवन किया। इस प्रकार जगह-जगह आदर-सम्मान पाते वे साक्षात् नक्षत्रनाथ चन्द्रमाके समान गन्धमादनकी घाटीको प्रकाशित करते हुए प्रियव्रतके पास पहुँचे ।।८।। प्रियव्रतको आत्मविद्याका उपदेश देनेके लिये वहाँ नारदजी भी आये हुए थे। ब्रह्माजीके वहाँ पहुँचनेपर उनके वाहन हंसको देखकर देवर्षि नारद जान गये कि हमारे पिता भगवान् ब्रह्माजी पधारे हैं; अतः वे स्वायम्भुव मनु और प्रियव्रतके सहित तुरंत खड़े हो गये और सबने उनको हाथ जोड़कर प्रणाम किया ।।९।।
भगवानपि भारत तदुपनीताहर्णः सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजयः प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं सदयहासावलोक इति होवाच ।।१०।।
श्रीभगवानुवाच
निबोध तातेदमृतं ब्रवीमि मासूयितुं देवमर्हस्यप्रमेयम् । वयं भवस्ते तत एष महर्षि- र्वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम् ।।११
न तस्य कश्चित्तपसा विद्यया वा न योगवीर्येण मनीषया वा । नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात् ।।१२
भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं शोकाय मोहाय सदा भयाय । सुखाय दुःखाय च देहयोग- मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते ।।१३
यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभिः सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिताः । सर्वे वहामो बलिमिश्वराय प्रोता नसीव द्विपदे चतुष्पदः ।।१४
ईशाभिसृष्टं ह्यवरुन्ध्द्महेऽङ्ग दुःखं सुखं वा गुणकर्मसङ्गात् ।