श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 944, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान्की उपासनासे इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था ॥३०॥
उस समय इनके रथके पहियोंसे जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ॥३१॥
उनके नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर द्वीप हैं। इनमेंसे पहले-पहलेकी अपेक्षा आगे-आगेके द्वीपका परिमाण दूना है और ये समुद्रके बाहरी भागमें पृथ्वीके चारों ओर फैले हुए हैं ॥३२॥
क्षारोदेक्षुरसोदसुरोदघृतोदक्षीरोददधिमण्डोद-शुद्धोदाः सप्त जलधयः सप्त द्वीपपरिखा१ इवाभ्यन्तरद्वीपसमाना एकैकश्येन२ यथानुपूर्वं सप्तस्वपि बहिर्द्धीपेषु पृथक्परित३ उपकल्पितास्तेषु४ जम्ब्वादिषु बर्हिष्मती- पतिरनुव्रतानात्मजानाग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहु५- हिरण्यरेतोघृतपृष्ठमेधातिथिवीतिहोत्रसंज्ञान् यथासंख्येन६ एकैकस्मिन् एकमेवाधिपतिं विदधे ॥३३॥ दुहितरं चोर्जस्वतीं नामोशनसे प्रायच्छद्यस्यामासीद् देवयानी नाम काव्यसुता ॥३४॥
नैवंविधः पुरुषकार उरुक्रमस्य
पुंसां तदङ्घ्रिरजसा जितषड्गुणानाम् ।
चित्रं विदूरविगतः सकृदाददीत७
यन्नामधेयमधुना स८ जहाति बन्धम् ॥३५
स एवमपरिमितबलपराक्रम एकदा तु देवर्षि- चरणानुशयनानुपतितगुणविसर्गसंसर्गेणानिर्वृत-मिवात्मानं मन्यमान आत्मनिर्वेद इदमाह ॥३६॥ अहो असाध्वनुष्ठितं यदभिनिवेशितोऽहमिन्द्रियै- रविद्यारचितविषमविषयान्धकूपे तद् अलम् अलम् अमुष्या वनिताया विनोदमृगं मां धिग्धिगिति गर्हयाञ्चकार ॥३७॥
सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईखके रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठे और मीठे जलसे भरे हुए हैं। ये सातों द्वीपोंकी खाइयोंके समान हैं और परिमाणमें अपने भीतरवाले द्वीपके बराबर हैं। इनमेंसे एक-एक क्रमशः अलग-अलग सातों द्वीपोंको बाहरसे घेरकर स्थित हैं।* बर्हिष्मतीपति महाराज प्रियव्रतने अपने अनुगत पुत्र आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, मेधातिथि और वीतिहोत्रमेंसे क्रमशः एक-एकको उक्त जम्बू आदि द्वीपोंमेंसे एक-एकका राजा बनाया ॥३३॥ उन्होंने अपनी कन्या ऊर्जस्वतीका विवाह शुक्राचार्यजीसे किया; उसीसे शुक्रकन्या देवयानीका जन्म हुआ ॥३४॥ राजन्! जिन्होंने भगवच्चरणारविन्दोंकी रजके प्रभावसे शरीरके भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु—इन छः गुणोंको अथवा मनके सहित छः इन्द्रियोंको जीत लिया है, उन भगवद्भक्तोंका ऐसा पुरुषार्थ होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि वर्णबहिष्कृत चाण्डाल आदि नीच योनिका पुरुष भी भगवान्के नामका केवल एक बार उच्चारण करनेसे तत्काल संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता
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