श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 958, कुल 1617 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थोऽध्यायः
ऋषभदेवजीका राज्यशासन
श्रीशुक उवाच
अथ ह तमुत्पत्त्यैवाभिव्यज्यमान-भगवल्लक्षणं साम्योपशमवैराग्यैश्वर्यमहा-विभूतिभिरनुदिनमेधमानानुभावं$^१$ प्रकृतयः प्रजा ब्राह्मणा$^२$ देवताश्चावनितलसमवनायातितरां जगृधुः ॥१॥ तस्य ह वा इत्थं वर्ष्मणा वरीयसा बृहच्छ्लोकेन चौजसा बलेन श्रिया यशसा वीर्य-शौर्याभ्यां च पिता ऋषभ इतीदं नाम चकार ॥२॥
तस्य$^३$ हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवानृषभदेवो योगेश्वरः प्रहस्यात्मयोगमायया$^४$ स्ववर्षमजनाभं नामाध्यवर्षत् ॥३॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! नाभिनन्दनके अंग जन्मसे ही भगवान् विष्णुके वज्र-अंकुश आदि चिह्नोंसे युक्त थे; समता, शान्ति, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि महाविभूतियोंके कारण उनका प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता जाता था। यह देखकर मन्त्री आदि प्रकृतिवर्ग, प्रजा, ब्राह्मण और देवताओंकी यह उत्कट अभिलाषा होने लगी कि ये ही पृथ्वीका शासन करें ॥१॥
उनके सुन्दर और सुडौल शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणोंके कारण महाराज नाभिने उनका नाम ‘ऋषभ’ (श्रेष्ठ) रखा ॥२॥
एक बार भगवान् इन्द्रने ईर्ष्यावश उनके राज्यमें वर्षा नहीं की। तब योगेश्वर भगवान् ऋषभने इन्द्रकी मूर्खतापर हँसते हुए अपनी योग-मायाके प्रभावसे अपने वर्ष अजनाभखण्डमें खूब जल बरसाया ॥३॥
नाभिस्तु यथाभिलषितं सुप्रजस्त्व-मवरुध्यातिप्रमोदभरविह्वलो गद्गदाक्षरया गिरा स्वैरं गृहीतनरलोकसधर्मं भगवन्तं पुराणपुरुषं मायाविलसितमतिर्वत्स तातेति सानुराग-मुपलालयन् परां निर्वृतिमुपगतः ॥४॥
विदितानुरागमापौरप्रकृति जनपदो राजा नाभिरात्मजं समयसेतुरक्षायामभिषिच्य ब्राह्मणे-षूपनिधाय सह$^१$ मेरुदेव्या विशालायां प्रसन्ननिपुणेन तपसा समाधियोगेन नरनारायणाख्यं भगवन्तं वासुदेवमुपासीनः कालेन$^२$ तन्महिमानमवाप ॥५॥
यस्य$^३$ ह पाण्डवेय श्लोकावुदाहरन्ति—को$^४$ नु तत्कर्म राजर्षेर्नाभेरन्वाचरेत्पुमान् । अपत्यतामगाद्यस्य हरिः शुद्धेन कर्मणा ॥६
ब्रह्मण्योऽन्यः कुतो नाभेर्विप्रा मङ्गलपूजिताः ।