श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्निति होवाच ॥१९॥
भगवान् ऋषभदेवके शासनकालमें इस देशका कोई भी पुरुष अपने लिये किसीसे भी अपने प्रभुके प्रति दिन-दिन बढ़नेवाले अनुरागके सिवा और किसी वस्तुकी कभी इच्छा नहीं करता था। यही नहीं, आकाशकुसुमादि अविद्यमान वस्तुकी भाँति कोई किसीकी वस्तुकी ओर दृष्टिपात भी नहीं करता था ॥१८॥ एक बार भगवान् ऋषभदेव घूमते-घूमते ब्रह्मावर्त देशमें पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंकी सभामें उन्होंने प्रजाके सामने ही अपने समाहितचित्त तथा विनय और प्रेमके भारसे सुसंयत पुत्रोंको शिक्षा देनेके लिये इस प्रकार कहा ॥१९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
१. प्रा० पा०—सौम्योपशम०। २. प्रा० पा०—ब्राह्मणदेवता०। ३. प्रा० पा०—यस्य ही०। ४. प्रा० पा०—प्रेममायया वर्षमजनाथं।
१. प्रा० पा०—सह देव्या। २. प्रा० पा०—काले तन्महिमा०। ३. प्रा० पा०—यत्र। ४. प्रा० पा०—कस्तत्कर्म। ५. प्रा पा—भगवानृषभः स्व।
१. प्रा० पा०—कर्मशुद्धा। २. प्रा० पा०—भगवान्सर्वज्ञ आत्म०। ३. प्रा० पा०—केवल आनन्दा०। ४. प्रा० पा०—लोकानयमयत्। ५. प्रा० पा०—सकलधर्माधर्म ब्राह्मं।