भारतकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 963

पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् । यावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५ एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्ते अविद्ययाऽऽत्मन्युपधीयमाने । प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥६ यदा न पश्यत्ययथा गुणेहां स्वार्थे प्रमत्तः सहसा विपश्चित् । गतस्मृतिर्विन्दति तत्र तापा- नासाद्य मैथुन्यमगारमज्ञः ॥७ पुंसः स्त्रिया मिथुनीभावमेतं तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः । अतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तै- र्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥८ यदा मनोहृदयग्रन्थिरस्य कर्मानुबद्धो दृढ आश्लथेत् । तदा जनः सम्परिवर्ततेऽस्मा- न्मुक्तः परं यात्यतिहाय हेतुम् ॥९ हंसे गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च । सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१० मत्कर्मभिर्मत्कथया च नित्यं मद्देवसङ्गाद् गुणकीर्तनान्मे । निर्वैरसाम्योपशमेन पुत्रा जिहासया देहगेहात्मबुद्धेः ॥११

जबतक जीवको आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा नहीं होती, तभीतक अज्ञानवश देहादिके द्वारा उसका स्वरूप छिपा रहता है। जबतक यह लौकिक-वैदिक कर्मोंमें फँसा रहता है, तबतक मनमें कर्मकी वासनाएँ भी बनी ही रहती हैं और इन्हींसे देहबन्धनकी प्राप्ति होती है ॥५॥ इस प्रकार अविद्याके द्वारा आत्मस्वरूपके ढक जानेसे कर्मवासनाओंके वशीभूत हुआ चित्त