श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमोऽध्यायः
भरत-चरित्र
श्रीशुक उवाच
भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनु-
शासनपरः पञ्चजनीं विश्वरूपदुहितरमुपयेमे ॥१॥ तस्यामु ह वा आत्मजान्
कात्स्न्र्येनानुरूपानात्मनः पञ्च जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि ॥२॥ सुमतिं
राष्ट्रभृतं सुदर्शनमावरणं धूम्रकेतुमिति । अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य
व्यपदिशन्ति ॥३॥
स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवद् उरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः
प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत् ॥४॥ ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं
क्रतुभिरुच्चावचैः श्रद्धयाऽऽहृताग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्य-पशुसोमानां
प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुर्होत्रविधिना ॥५॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे। भगवान्
ऋषभदेवने अपने संकल्पमात्रसे उन्हें पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त कर दिया। उन्होंने
उनकी आज्ञामें स्थित रहकर विश्वरूपकी कन्या पंचजनीसे विवाह किया ॥१॥
जिस प्रकार तामस अहंकारसे शब्दादि पाँच भूततन्मात्र उत्पन्न होते हैं—उसी प्रकार
पंचजनीके गर्भसे उनके सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पाँच पुत्र हुए
—जो सर्वथा उन्हींके समान थे। इस वर्षको, जिसका नाम पहले अजनाभवर्ष था, राजा
भरतके समयसे ही 'भारतवर्ष' कहते हैं ॥२-३॥
महाराज भरत बहुज्ञ थे। वे अपने-अपने कर्मोंमें लगी हुई प्रजाका अपने बाप-दादोंके
समान स्वधर्ममें स्थित रहते हुए अत्यन्त वात्सल्यभावसे पालन करने लगे ॥४॥ उन्होंने होता,
अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा—इन चार ऋत्विजों द्वारा कराये जानेवाले प्रकृति और विकृति*
दोनों प्रकारके अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशु और सोम आदि छोटे-बड़े क्रतुओं
(यज्ञों)-से यथासमय श्रद्धापूर्वक यज्ञ और क्रतुरूप श्रीभगवान्का यजन किया ॥५॥
सम्प्रचरत्सु नानायागेषु विरचिताङ्ग-क्रियेष्वपूर्व यत्तत्क्रियाफलं धर्माख्यं परे
ब्रह्मणि यज्ञपुरुषे सर्वदेवतालिङ्गानां मन्त्राणा-मर्थनियामकतया साक्षात्कर्तरि
परदेवताया भगवति वासुदेव एव¹ भावयमान आत्मनैपुण्य-मृदितकषायो
हविःष्वध्वर्युभिर्गृह्यमाणेषु स यजमानो यज्ञभाजो देवांस्तान् पुरुषा-
वयवेष्वभ्यध्यायत् ॥६॥ एवं कर्मविशुद्ध्या विशुद्धसत्त्वस्यान्तर्हृदयाकाशशरीरे²
ब्रह्मणि भगवति वासुदेवे महापुरुषरूपोपलक्षणे
श्रीवत्सकौस्तुभवनमालारिदरगदादिभिरुपलक्षिते निजपुरुषहृल्लिखितेनात्मनि