श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
करनेवालोंके लिये भी यथासम्भव वस्त्र-द्रव्य आदि।
पाठके लिये पुस्तक
भागवत, रामायण, गीता, सहस्रनाम आदि।
हवनके लिये सामग्री
वेदीके लिये स्वच्छ बालू एक बोरा, सूखी आमकी लकड़ी दो मन, कुशकण्डिकाके लिये कुशा, दूर्वा, अग्नि लानेके लिये दो कांस्यपात्र, एक पूर्णपात्र पीतलका बड़ा-सा, यज्ञपात्र—प्रणीता, प्रोक्षणी, स्रुवा, स्रुक्, पूर्णाहुतिपात्र, चरुस्थाली, आज्यस्थाली (काँसीका बड़ा-सा कटोरा), हवनीय पदार्थ—मधुमिश्रित खीर, छायापात्र-दानके लिये काँसेकी छोटी एक कटोरी तथा उसके लिये घी।
तिल १० सेर, चावल ५ सेर, जौ १ $\frac{१}{३}$ सेर शुद्ध घी ४ सेर, शुद्ध चीनी १ $\frac{१}{३}$ सेर, पंचमेवा २ सेर (पिश्ता, बादाम, किशमिश अखरोट और काँजू)—इन सबको मिलाकर हवनसामग्री बनायी जाती है। फिर इसमें सुगन्धित द्रव्य (कपूरकाचरी, छड़छड़ीला, नागरमोथा, अगर-तगर, चन्दनचूर्ण आदि) आवश्यकतानुसार मिला देने चाहिये। बलिके लिये पापड़, उड़द, दही, चावल, रूईकी बत्ती, दक्षिणा, क्षेत्रपाल-बलिके लिये हँड़िया, काजल, सिंदूर, दीपक, दक्षिणा आदि। पूर्णाहुतिके लिये नारियलका गोला इत्यादि, वितरणके लिये प्रसाद। ब्राह्मण-भोजनके लिये मधुमिश्रित खीर तथा अन्यान्य मधुर पकवान, पूरी-साग आदि। हवनकर्ता ब्राह्मणोंके लिये वरण और दक्षिणा आदि।
कथा-समाप्तिके पश्चात् कथावाचकको भेंट देनेके लिये वस्त्र, आभूषण, नकद रुपये आदि।
वन्दनम्
सर्गस्थितिनिरोधार्थं कामाकाममयो हि यः ।
तं कामं कामकामघ्नं कामाभावाय कामये ।।
यत्कामिनीकेलिकलापकुण्ठितः कामोऽप्यकामा विमदो बभूव ह ।
तं मानिनीमानदमानदं सदा श्रीमोहनं मोहनमानतोऽस्म्यहम् ।।
यस्याङ्घ्रिपङ्कजपरागपरप्रभावाद् भूत्वा कृती कृतिमतां सृतिमाचरामि ।
तं सद्गुरुं सततसर्वसुखं सदग्रयं वन्दे सदा विमलबोधघनं विचित्रम् ।।
व्यासं व्यासकरं वन्दे मुनिं नारायणं स्वयं ।
यतः प्राप्तकृपालोका लोका मुक्ताः कलेर्ग्रहात् ।।
यस्य तुण्डाच्च्युतश्रूतो राजतेऽयं रसात्मकः ।
तमच्युतकथाकुञ्जे सुकूजन्तं शुकं भजे ।।
श्रीधरं श्रीधरं वन्दे श्रीधरैकपरायणम् ।
यस्यैव श्रीप्रसादेन श्रीधरेयं कृतिः कृता ।।
राधा भक्तिर्हरिर्ज्ञानं ताभ्यां या च समन्विता ।
तां श्रीभागवतीं गाथां वन्दे युगलरूपिणीम् ।।
।। श्रीहरिः ।।
श्रीमद्भागवतकी आरती
आरति अतिपावन पुरानकी । धर्म-भक्ति-विज्ञान-खानकी ।।टेक।। महापुरान भागवत निरमल । शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल । परमानन्द-सुधा-रसमय कल । लीला-रति-रस रसनिधानकी ।।आरति०।। कलि-मल-मथनि त्रिताप-निवारिनि । जन्म-मृत्युमय भव-भय-हारिनि । सेवत सतत सकल सुख-कारिनि । सुमहौषधि हरि-चरित-गानकी ।।आरति०।। विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि । विमल विराग विवेक विकाशिनि । भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि । परम ज्योति परमात्म-ज्ञानकी ।।आरति०।। परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि । रसिक-हृदय रस-रास विलासिनि । भुक्ति मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि । कथा अकिञ्चनप्रिय सुजानकी ।।आरति०।।
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