श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1006, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्यावनवाँ सर्ग
जटायु तथा रावणका घोर युद्ध और रावणके द्वारा जटायुका वध
जटायुके ऐसा कहनेपर राक्षसराज रावण क्रोधसे आँखें लाल किये अमर्षमें भरकर उन पक्षिराजकी ओर दौड़ा। उस समय उसके कानोंमें तपाये हुए सोनेके कुण्डल झलमला रहे थे॥ १ ॥
उस महासमरमें उन दोनोंका एक-दूसरेपर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाशमें वायुसे उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपसमें टकरा गये हों॥ २ ॥
उस समय गृध्र और राक्षसमें वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् १ पर्वत एक-दूसरेसे भिड़ गये हों॥ ३ ॥
रावणने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ४ ॥
पक्षिराज गृध्रजातीय जटायुने युद्धमें रावणके उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रोंका आघात सह लिया॥ ५ ॥
साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणिने अपने तीखे नखोंवाले पंजोंसे मार-मारकर रावणके शरीरमें बहुत-से घाव कर दिये॥ ६ ॥
तब दशग्रीवने क्रोधमें भरकर अपने शत्रुको मार डालनेकी इच्छासे दस बाण हाथमें लिये, जो कालदण्डके समान भयंकर थे॥ ७ ॥
महापराक्रमी रावणने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जानेवाले तीखे, पैने और भयंकर बाणोंद्वारा, जिनके मुखपर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराजको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ८ ॥
जटायुने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षसके रथपर बैठी हैं और नेत्रोंसे आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीरमें लगते हुए उन बाणोंकी परवा न करके सहसा उस राक्षसपर टूट पड़े॥ ९ ॥
महातेजस्वी पक्षिराज जटायुने मोती-मणियोंसे विभूषित, बाणसहित रावणके धनुषको अपने दोनों पैरोंसे मारकर तोड़ दिया॥ १० ॥